वीगन अभिनेत्री और गायिका ज़हरा एस. खान तथा PETA इंडिया ने सुरक्षित मुहर्रम के लिए मशीनी हाथी देने की पेशकश की

Posted on by Surjeet Singh

क्या इस बार जून में हैदराबाद के पुराने शहर में निकलने वाले बीबी-का-आलम मुहर्रम जुलूस में जीवित हाथी की जगह मशीनी हाथी दिखाई देगा? आमतौर पर इस जुलूस के लिए हाथी पड़ोसी राज्यों से किराए पर लाए जाते हैं। वीगन अभिनेत्री और गायिका ज़हरा एस. खान को उम्मीद है कि इस बार बदलाव देखने को मिलेगा। इसी उद्देश्य से उन्होंने पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया के साथ मिलकर तेलंगाना स्टेट वक्फ बोर्ड को असली हाथी के आकार का एक मशीनी (मैकेनिकल) हाथी उपहार में देने की पेशकश की है।

हाल ही में कर्नाटक के दुबारे एलीफेंट कैंप में 33 वर्षीय एक महिला की मौत ने बंदी हाथियों के पास जाने के खतरे को फिर उजागर कर दिया। महिला अपने पति और बच्चे के सामने हाथी के पैरों तले कुचल गई थी। बोर्ड को भेजे गए अपने पत्र में ज़हरा ने लिखा है कि बंदी हाथियों को प्रदर्शन करवाने के लिए जंजीरों में बांधकर रखा जाता है और उन्हें मारा पीटा भी जाता है। तेज आवाज़, भीड़ और शोरगुल वाले माहौल में हाथी तनाव में आ जाते हैं। ऐसे में जब कोई हाथी बेकाबू होता है, तो भीड़ में मौजूद लोगों की जान भी खतरे में पड़ जाती है।

मशीनी हाथी लगभग वह सभी काम कर सकते हैं जो असली हाथी करते हैं, लेकिन इसमें किसी पशु को तकलीफ नहीं होती। वे सिर हिला सकते हैं, कान और आंखें चला सकते हैं, पूंछ हिला सकते हैं, सूंड उठा सकते हैं और यहां तक कि पानी भी छिड़क सकते हैं। इन पर बैठने की व्यवस्था भी होती है, जिससे लोग इन पर सवारी कर सकते हैं। ये पहियों वाले मजबूत प्लेटफॉर्म पर चलते हैं।

मशीनी हाथी की एक सांकेतिक तस्वीर

ज़हरा ने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि मशीनी हाथियों का इस्तेमाल पहले से कई हिंदू मंदिरों और एक जैन मंदिर में किया जा रहा है। अब शादियों में भी इन्हें अपनाया जाने लगा है।

“कुरान और हदीस सभी जीवों के प्रति दया और करुणा का संदेश देते हैं। अगर तेलंगाना स्टेट वक्फ बोर्ड असली बंदी हाथी की जगह मशीनी हाथी का उपयोग करता है, तो वह एक संवेदनशील उदाहरण पेश करेगा और इस्लामी आयोजनों में इस तकनीक को अपनाने वाला देश का पहला बोर्ड बन सकता है।” अभिनेत्री और गायिका ज़हरा एस खान ने तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड को लिखे अपने पत्र में यह बात कही है।

 

बीते वर्षों में कई घटनाएं यह दिखा चुकी हैं कि हाथियों को ऐसे तनावपूर्ण माहौल में इस्तेमाल करना कितना खतरनाक हो सकता है। वर्ष 2004 में ‘गजलक्ष्मी’ नाम की एक हथिनी मुहर्रम जुलूस के दौरान बेकाबू हो गई थी, जिससे वहां मौजूद लोगों की जान खतरे में पड़ गई थी। वर्ष 2017 में कोल्हापुर की ‘माधुरी’ नाम की हथिनी, जिसने एक जैन मंदिर के मुख्य पुजारी की जान ले ली थी, उसे भी इस जुलूस के लिए किराए पर लाया गया था। पिछले साल ‘रूपावती’ नाम की एक दृष्टिबाधित हथिनी, जो दर्दनाक गठिया से पीड़ित थी, को भी जबरन मुहर्रम जुलूस में शामिल किया गया, जिससे कई लोगों की सुरक्षा खतरे में पड़ गई।

पिछले वर्ष ईद-उल-अज़हा से पहले ज़हरा ने PETA इंडिया और गैर-लाभकारी संस्था सर्व नीडी वॉलंटियर ऑर्गेनाइजेशन के साथ मिलकर हैदराबाद में ज़रूरतमंद 1,000 लोगों को पौष्टिक और स्वादिष्ट वीगन सोया बिरयानी वितरित की थी।

 

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भारत में धार्मिक संस्थानों द्वारा जीवित हाथियों के इस्तेमाल के विकल्प को बढ़ावा देने की मुहिम PETA इंडिया ने शुरू की थी। आज देशभर के मंदिरों में 30 से अधिक मशीनी हाथियों का उपयोग हो रहा है। इनमें से 26 मशीनी हाथी PETA इंडिया ने उन मंदिरों को भेंट किए हैं जिन्होंने भविष्य में कभी भी जीवित हाथी न रखने और न किराए पर लेने का फैसला किया।