गायिका और अभिनेत्री ज़हरा एस ख़ान ने ईद-उल-अजहा के मौके पर PETA इंडिया के साथ मिलकर हैदराबाद में सैकड़ों लोगों को वीगन बिरयानी वितरित की

Posted on by Erika Goyal

ईद-उल-अजहा के उपलक्ष्य में आज PETA इंडिया  ने सर्व नीडी वॉलंटरी ऑर्गनाइज़ेशन  के सहयोग से वीगन जीवनशैली जीने वाली मशहूर गायिका और अभिनेत्री ज़हरा एस ख़ान  के साथ मिलकर हैदराबाद में 1000 ज़रूरतमंद लोगों को स्वादिष्ट और पोषणयुक्त वीगन सोया बिरयानी वितरित की। ज़हरा को फिल्म सत्यमेव जयते  के लोकप्रिय गीत कुसु कुसु  के लिए जाना जाता है। उन्होंने हाल ही में स्काईफोर्स  फिल्म के एक गानेरंग और राजकुमार राव  की फिल्म भुल चुक माफ़  के एक ट्रैक में भी अपनी आवाज़ दी है।

 ईद-उल-अजहा के इस मुबारक मौके पर हैदराबाद में 1000 लोगों को स्वादिष्ट वीगन बिरयानी बाँटकर मुझे बहुत संतोष हुआ और अल्लाह का शुक्र अदा करने का मौका मिला। ईद पर कई लोग अल्लाह की रहमत को याद करते हुए करुणा के साथ खाना या कपड़े बाँटते हैं, बच्चों की पढ़ाई में मदद करते हैं या किसी भलाई के काम में हिस्सा लेते हैं। ऐसे नेक काम इंसानियत के साथ-साथ पशुओं के लिए भी फायदेमंद होते हैं। 

ज़हरा एस ख़ान

सभी धर्म हमें दया और करुणा का संदेश देते हैं, और किसी भी धर्म में मांस खाना अनिवार्य नहीं है। हर अवसर, चाहे वह धार्मिक हो या साधारण, करुणा के साथ मनाया जा सकता है ताकि किसी बेज़ुबान को तकलीफ़ न पहुँचे। ईद के सच्चे संदेश को समझते हुए अगर हम कुर्बानी का ऐसा रूप चुनें जिनमें किसी पशु का जीवन न छीना जाए, तो यही इंसानियत की सबसे बड़ी मिसाल होगी। यह एक ऐसा फ़ैसला हो सकता है, जो किसी मासूम पशु के लिए ज़िंदगी और मौत का फर्क बन जाए।

हमें जो खाने का हुक्म दिया गया है, वह ‘हलाल’ और ‘तैय्यब’ होना चाहिए, यानी ऐसा भोजन जो न केवल शरियत के अनुसार जायज़ हो बल्कि पाक, पोषणयुक्त और इंसाफ़ के साथ हासिल किया गया हो। लेकिन सच्चाई यह है कि आज का मांस उद्योग इन मूल्यों का हर स्तर पर उल्लंघन करता है। फैक्ट्री फार्मों में की जाने वाली क्रूरता से लेकर पशुओं की भलाई की अनदेखी और आख़िर में उनकी निर्दयी हत्या तक, कहीं भी रहम नहीं दिखाई देता। हमें खुद से यह सवाल करना चाहिए कि क्या कोई चीज़ वाकई हलाल हो सकती है, अगर वह किसी मासूम को असहनीय पीड़ा देती हो? जवाब है, नहीं।

हर साल ईद-उल-अजहा के मौके पर हज़ारों पशुओं जैसे बकरों, भैंसों और मुर्गों की कुर्बानी दी जाती है। इनमें से कई पशुओं को पशु परिवहन से जुड़े कानूनों का उल्लंघन करते हुए बेहद भीड़भाड़ वाले ट्रकों में ठूंस-ठूंसकर ले जाया जाता है, जिससे उनकी हड्डियाँ टूट जाती हैं, उनका दम घुटने लगता है और वे भारी कष्ट झेलते हैं। कुर्बानी के समय कई बार बिना किसी प्रशिक्षण के लोग इन पशुओं का गला रेत देते हैं या उनका सिर धड़ से अलग कर देते हैं, वह भी ऐसे हालात में जब दूसरे डरे-सहमे पशु सब कुछ अपनी आंखों के सामने देख रहे होते हैं। ऐसा करना कानूनन गलत है, क्योंकि पंजीकृत वधशालाओं में वध से पहले पशुओं को बेहोश करना अनिवार्य है, लेकिन इस नियम की अक्सर अनदेखी की जाती है।

पशु समझदार और सामाजिक जीव होते हैं, जिनकी अपनी भावनाएँ और अलग पहचान होती है। बकरियाँ जिज्ञासु होती हैं, समस्याओं को सुलझा सकती हैं, गहरे रिश्ते बनाती हैं और चेहरों को याद रख सकती हैं। भैंसें अपने बच्चों से बेहद लगाव रखती हैं और ज़रूरत पड़ने पर जान देकर भी उनकी हिफाज़त करती हैं। मुर्गियाँ न सिर्फ गिनती कर सकती हैं, बल्कि वे आने वाले समय की चिंता करती हैं और इंसानों की तरह सपने भी देखती हैं।

मांस और अन्य पशु-उत्पन्न खाद्य पदार्थों का सेवन न सिर्फ पशुओं के लिए हानिकारक है, बल्कि यह हमारी सेहत को भी गंभीर नुकसान पहुँचाता है। यह वैज्ञानिक रूप से साबित हो चुका है कि मांस खाने से दिल की बीमारियाँ, स्ट्रोक, डायबिटीज़, कैंसर और मोटापा जैसी समस्याएँ बढ़ती हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी प्रभावों से बचने के लिए वैश्विक स्तर पर वीगन भोजन को अपनाना अनिवार्य है।

हम जब भी करुणा से भरा कोई काम करते हैं, जैसे कि किसी के साथ वीगन खाना बाँटना, तो हम एक ऐसी दुनिया की ओर कदम बढ़ाते हैं जहाँ हर मज़हब और हर दिन का आधार करुणा हो। इस ईद, आइए पशुओं को तकलीफ़ नहीं, खुश होने की वजह दें। ईद मुबारक!

पशु क्रूरता से मुक्त ईद-उल-अजहा मनाने का संकल्प लें पशु बलि समाप्त करने के लिए कानूनों में संशोधन कराने में सहायता करें