PETA इंडिया की वैज्ञानिक ने एक पॉडकास्ट पर पशु-मुक्त विज्ञान के भविष्य पर बात की
विज्ञान के भविष्य के लिए क्या रखा है? भारत को पशु-मुक्त परीक्षणों के क्षेत्र में दुनिया का अग्रणी देश बनने के लिए क्या करना होगा? रिसर्च पेपर लिखते समय पीने के लिए कैफीन वाला सबसे अच्छा पेय कौन-सा है? SnailShow Podcast के होस्ट अमित खरे ने इन सभी सवालों और इससे भी बहुत कुछ पर चर्चा करने के लिए PETA इंडिया की वैज्ञानिक डॉ. अंकिता पांडे से बातचीत की!
चर्चा में नवाचार से लेकर टिकाऊपन तक कई विषयों पर बात हुई, लेकिन पशुओं पर किए गए असफल परीक्षणों की गंभीर वास्तविकता इस बातचीत का मुख्य विषय रही। डॉ. पांडे ने बताया कि पशुओं पर परीक्षण में सफल होने वाली कई दवाएँ तब असफल हो जाती हैं, जब उनका इस्तेमाल इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल में किया जाता है। इसमें अल्जाइमर रोग, कैंसर और स्ट्रोक जैसे क्षेत्रों में किए जाने वाले शोध भी शामिल हैं। इन स्पष्ट कमियों के कारण विज्ञान की दुनिया के कई लोग ऐसे तरीकों की ओर बढ़ रहे हैं, जो इंसानों से संबंधित अधिक उपयोगी और प्रभावी जानकारी दे सकें।
डॉ. अंकिता ने कहा, “हम कई अलग-अलग तरीकों को मिलाकर विज्ञान को और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि हमें मानव शरीर और उसकी कार्यप्रणाली के बारे में अधिक जानकारी मिल सके।”
पशु-मुक्त नवाचारों से केवल इंसानों को ही फायदा नहीं होता। जैसा कि डॉ. अंकिता बताती हैं, हर साल 10 करोड़ से अधिक पशुओं का परीक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है। ये पशु अक्सर अपना जीवन बिना किसी प्राकृतिक सुविधा वाली छोटी-छोटी पिंजरों में बिताते हैं, उनकी आँखों और त्वचा जैसे संवेदनशील अंगों पर रसायन लगाए जाते हैं या उन्हें जानबूझकर बीमारियों से संक्रमित किया जाता है।
सौभाग्य से, ऐसी तकनीक पहले से मौजूद है जो पशुओं पर किए जाने वाले कई परीक्षणों की जगह ले सकती है। डॉ. अंकिता ने इसका एक दिलचस्प उदाहरण 3D ऑर्गेनॉइड्स के रूप में बताया। ये इंसानी कोशिकाओं से प्रयोगशाला में तैयार की गई बहुत छोटी संरचनाएँ होती हैं, जो इंसानी अंगों और ऊतकों की तरह काम करती हैं। शोधकर्ता इन उन्नत मॉडलों की मदद से यह पता लगा सकते हैं कि दवाएँ और रसायन इंसानी शरीर को किस तरह प्रभावित करते हैं, वह भी पशुओं पर दर्दनाक प्रक्रियाएँ किए बिना।
PETA इंडिया के वैज्ञानिक ऐसे नए और आधुनिक तरीकों को बढ़ावा देने में सबसे आगे रहे हैं और उनका काम केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। जैसा कि डॉ. पांडे ने बताया, किसी भी दिन वह सम्मेलनों में व्याख्यान दे सकती हैं, इंसानों से संबंधित परीक्षणों के लिए सुझाव तैयार कर सकती हैं या अन्य वैज्ञानिकों के साथ बैठकर उन्हें यह “समझाने की कोशिश कर सकती हैं कि चूहे की कोशिका की तुलना में इंसानी कोशिका बेहतर क्यों हो सकती है।”
डॉ. अंकिता ने कहा, “टॉक्सिकोलॉजिस्ट बनने के लिए इससे बेहतर और रोमांचक समय कभी नहीं रहा है।”
भारत ने पशुओं पर होने वाले परीक्षणों पर रोक लगाने की दिशा में पहले ही महत्वपूर्ण प्रगति की है। इसमें कॉस्मेटिक उत्पादों के परीक्षण पर 2014 से लागू प्रतिबंध भी शामिल है। डॉ. अंकिता ने यह भी बताया कि पशु-मुक्त तरीकों को कीटनाशकों के परीक्षण से जुड़ी भारत की 2017 और 2023 की गाइडलाइंस में पहले ही शामिल किया जा चुका है। इससे पता चलता है कि भारत तेजी से विकसित हो रही अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं के साथ आगे बढ़ने के लिए तैयार है।
डॉ. अंकिता के अनुसार, नए तरीकों को विकसित करना अब सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। उन्होंने कहा, “विज्ञान स्थापित हो चुका है। भारत में ऐसी प्रयोगशालाएँ हैं जो इन पशु-मुक्त तरीकों का इस्तेमाल करने में सक्षम हैं।” अब अगली चुनौती लोगों में इन तरीकों की जानकारी और भरोसा बढ़ाना है, ताकि उद्योग और नियामक नियमित रूप से इन पशु-मुक्त तरीकों का इस्तेमाल और उन्हें स्वीकार करें। जैसा कि डॉ. अंकिता ने बताया, नए तरीकों को अपनाने का मतलब अक्सर वैज्ञानिकों से उन प्रक्रियाओं पर दोबारा विचार करने के लिए कहना होता है, जिन पर वे दशकों से भरोसा करते आए हैं। उन्होंने कहा, “असल में आप उनसे उस चीज़ पर सवाल करने के लिए कह रहे हैं, जो उन्होंने पूरी ज़िंदगी सीखी है।”
हाल ही में प्रकाशित एक पेपर में डॉ. अंकिता ने उद्योग और सरकार के विशेषज्ञों के साथ मिलकर कीटनाशकों के पशुओं पर परीक्षण से जुड़ी भारत की नियामक आवश्यकताओं और पशु-मुक्त तरीकों को स्वीकार करने की मौजूदा व्यवस्था का अध्ययन किया। (संभवतः इस दौरान वह अपनी पसंदीदा रिसर्च साथी चाय पी रही होंगी।) उन्होंने दूसरे देशों का भी अध्ययन किया ताकि यह पता लगाया जा सके कि इन देशों ने पशु-मुक्त विज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए कौन-से कदम उठाए हैं। इस पेपर में Central Insecticides Board and Registration Committee (CIB&RC) जैसे नियामक निकायों द्वारा पशु-मुक्त तरीकों के इस्तेमाल को तेज़ करने के लिए उठाए जा सकने वाले नीतिगत कदमों के सुझाव दिए गए हैं।
पशुओं पर होने वाले परीक्षणों के बारे में डॉ. अंकिता कहती हैं, “हम इनकी सीमाओं को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते, चाहे वे वैज्ञानिक हों, नैतिक हों या आर्थिक… ऐसा कोई दूसरा क्षेत्र नहीं है जहाँ बार-बार मिलने वाली भारी असफलता को स्वीकार किया जाता हो। समय के साथ आगे बढ़ना हर वैज्ञानिक और नियामक की जिम्मेदारी है।”
हम भारत में यह बदलाव अपनी आँखों के सामने देख रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इंसानों, पशुओं और पर्यावरण के लिए सबसे बेहतर विज्ञान को अपनाना देश के विकसित भारत के लक्ष्य के अनुरूप है। जब डॉ. अंकिता से भारत के भविष्य के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया, “मैं कहूँगी कि विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में एक अग्रणी है”
भारत में पशु-मुक्त विज्ञान का भविष्य बनाने में मदद करें
भारत वैज्ञानिक नवाचार के एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहाँ अत्याधुनिक तकनीक, इंसानों के लिए अधिक प्रासंगिक पशु-मुक्त तरीके और करुणा मिलकर कीटनाशकों की विषाक्तता के आकलन का भविष्य तय कर सकते हैं। लेकिन वहाँ तक पहुँचने के लिए वैज्ञानिकों को आपकी मदद की जरूरत है!
