PETA India के वैज्ञानिक भविष्य में कीटनाशक विषाक्तता (pesticide toxicity) परीक्षण के लिए एक नई रूपरेखा तैयार करने में सहयोग कर रहे हैं।

Posted on by Surjeet Singh

लगभग 100 साल पुराने ऐसे परीक्षण तरीके, जिनमें विषाक्तता (toxicity) जांच के लिए पशुओं को मारा जाता है, यह भरोसेमंद रूप से यह नहीं बता पाते कि रसायन मनुष्यों या पर्यावरण पर कैसे असर डालेंगे। लेकिन एक नया, महत्वपूर्ण शोध-पत्र, जिसे PETA इंडिया के वैज्ञानिकों ने उद्योग और सरकारी विशेषज्ञों के साथ मिलकर सह-लेखित किया है, इस पुरानी व्यवस्था को चुनौती देता है।

हर साल, कीटनाशक विषाक्तता परीक्षणों में हजारों पशुओं का उपयोग किया जाता है। इन परीक्षणों में पशुओं को मजबूर किया जाता है कि वे जहरीले रसायन निगलें या सांस के जरिए अंदर लें, या उन्हें उनकी आँखों या त्वचा पर लगाया जाता है। यह नया शोध-पत्र यह दिखाता है कि भारत में वर्तमान में कहाँ-कहाँ गैर-पशु (non-animal) परीक्षण विधियों को कीटनाशक पंजीकरण की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्वीकार किया जा सकता है, और कहाँ आगे बढ़ने के तुरंत अवसर मौजूद हैं। यह भारत में अपनी तरह का पहला समीक्षा अध्ययन है, जो न केवल मौजूदा नियामक लचीलेपन को रेखांकित करता है, बल्कि अत्याधुनिक गैर-पशु परीक्षण विधियों के उपयोग को बढ़ाने के रास्ते भी सुझाता है।

white rabbit photo from pixabay

ये मार्ग आगे बढ़ने के लिए कुछ प्रमुख कदम बताते हैं, जिनमें भारत के नियमों को अपडेट करना, वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त गैर-पशु (non-animal) परीक्षण विधियों को अपनाना, और वैज्ञानिक समुदाय को पशु-रहित तरीकों का प्रशिक्षण देना शामिल है। इसके साथ ही यह पेपर यह भी समझाता है कि नियामकों, उद्योग और व्यापक समुदाय के बीच बेहतर संवाद से गैर-पशु तरीकों के उपयोग में भरोसा और भी बढ़ेगा।

PETA इंडिया निर्णय लेने वालों से लगातार आग्रह करता रहेगा कि वे इन कदमों को अपनाएँ और नियामकों, उद्योग तथा अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर गैर-पशु तरीकों को पूरी तरह से स्वीकार करें। ऐसा करने से भारत मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा में वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में आ सकता है, और कीटनाशक परीक्षण में पशुओं के उपयोग को समाप्त किया जा सकता है।

पुराने तरीकों को छोड़ें, नए को अपनाएँ!

भारत विज्ञान के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, जहाँ अत्याधुनिक तकनीक, मानव-प्रासंगिक गैर-पशु परीक्षण विधियाँ और करुणा मिलकर कीटनाशक विषाक्तता आकलन के भविष्य को आकार दे सकते हैं। लेकिन इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए वैज्ञानिकों को आपकी मदद की ज़रूरत है।

कदम उठाएँ और :

अधिकारियों से आग्रह करें कि वे कीटनाशक विषाक्तता परीक्षण में गैर-पशु विधियों को प्राथमिकता दें