शाहदरा टिम्बर मार्केट हुआ ‘पशु-गाड़ी मुक्त’: PETA इंडिया की दिल्ली मशीनीकरण परियोजना से जुड़े अंतिम 10 पूर्व पशु-गाड़ी मालिक

Posted on by Surjeet Singh

दिल्ली के शाहदरा टिम्बर मार्केट क्षेत्र को आधिकारिक रूप सेपशु-गाड़ी मुक्तघोषित किया गया। इस अवसर पर आयोजित समारोह में पशु-गाड़ियों का उपयोग करने वाले अंतिम 10 पूर्व मालिकों को बैटरी से चलने वाले ई-रिक्शे सौंपे गए। समारोह में रोहतास नगर की पार्षद सुश्री शिवानी पंचाल, सामुदायिक प्रतिनिधि कमल किशोर, रमेश वर्मा और रामप्रकाश, तथा परियोजना के लाभार्थी उपस्थित रहे।

दिल्ली में नांगलोई के असम टिम्बर मार्केट के बाद शाहदरा टिम्बर मार्केटपशु-गाड़ी मुक्तघोषित होने वाला दूसरा बाजार बन गया है। इस नवीनतम पहल के साथ, PETA इंडिया की दिल्ली मशीनीकरण परियोजना अब तक 200 से अधिक पूर्व पशु-गाड़ी मालिकों के पुनर्वास में मदद कर चुकी है। साथ ही, 200 से अधिक बैलों, घोड़ों और अन्य अश्ववंशी पशुओं को कठिन श्रम से भरे जीवन से मुक्ति मिली है।

अपने क्षेत्र में इस बदलाव के बाद पार्षद सुश्री शिवानी पंचाल ने दिल्ली के माननीय महापौर श्री प्रवेश वाही को पत्र लिखकर दिल्ली नगर निगम के 4 जनवरी 2010 के प्रस्ताव संख्या 590 को सख्ती से लागू करने का आग्रह किया है। इस प्रस्ताव के तहत दिल्ली में घोड़ा-गाड़ियों (टांगों) के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया था।

“पशुओं का स्थान उनके प्राकृतिक वातावरण में है, न कि शहरों और बाजारों में। इन ई-रिक्शों ने पूर्व पशु-गाड़ी मालिकों को सम्मानजनक और अधिक टिकाऊ आजीविका अपनाने का अवसर दिया है। इससे बाजार अधिक व्यवस्थित और स्वच्छ बनेगा तथा एक अधिक संवेदनशील समाज के निर्माण में भी मदद मिलेगी। एक प्रगतिशील समाज में पशु-गाड़ियां उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि माल ढुलाई के लिए बिना पशुओं के इस्तेमाल वाले अन्य आधुनिक विकल्प लोगों और पशुओं दोनों के लिए लाभदायक हैं।” –  सुश्री शिवानी पंचाल , रोहताश नगर की नगर निगम पार्षद

PETA इंडिया की दिल्ली मशीनीकरण परियोजना, जिसे गिविंग इकोनॉमी चेंजमेकर्स अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है, उन बैलों, गधों,और घोड़ों जैसे पशुओं की सुरक्षा के लिए कार्य करती है, जिन्हें भारी बोझ ढोने के लिए मजबूर किया जाता है और जिनके साथ अक्सर क्रूरता की जाती है। साथ ही, यह परियोजना इन पशुओं पर निर्भर परिवारों को बेहतर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने में भी सहायता करती है।

बेहतर और आधुनिक परिवहन साधन उपलब्ध होने के बावजूद आज भी दिल्ली में सैकड़ों बैल और घोड़े धीमी गति से चलने वाली गाड़ियों और टांगों को खींचने के लिए मजबूर हैं। इससे यातायात प्रभावित होता है और सड़कों पर पशुओं के गोबर तथा इस काम के दौरान मरने वाले पशुओं के शवों के कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी बुरा असर पड़ता है। इन पशुओं से अक्सर बीमार या घायल होने की स्थिति में भी काम कराया जाता है। उन्हें अधिक भार खींचने के लिए चाबुक, नाक में डाली जाने वाली दर्दनाक रस्सियां और नुकीले लगाम जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया जाता है। उन्हें पर्याप्त भोजन, स्वच्छ पानी और तेज धूप से बचने के लिए छाया भी नहीं मिलती। आमतौर पर उनसे जीवनभर काम कराया जाता है और घाव, फोड़े, मांसपेशियों व जोड़ों की बीमारियां, कैंसर, अंधापन तथा जुए से होने वाले घाव जैसी गंभीर समस्याओं के बावजूद उन्हें पशु-चिकित्सकीय उपचार नहीं मिल पाता।

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