व्यावहारिक प्रशिक्षण, पशुओं पर प्रयोग नहीं! PETA के वैज्ञानिकों ने पशु-मुक्त टॉक्सिसिटी टेस्टिंग पर प्रशिक्षण का सह-आयोजन किया।
इस महीने, PETA के वैज्ञानिकों ने Institute for In Vitro Sciences (IIVS) के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश के नोएडा स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बायोलॉजिकल्स और गुजरात के वापी स्थित जय रिसर्च फाउंडेशन में व्यावहारिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए। पहली बार ये प्रशिक्षण कार्यक्रम भारत के वैज्ञानिक समुदाय के लिए खुले थे।
दुनियाभर में हर साल लाखों पशुओं पर टॉक्सिसिटी टेस्ट (विषाक्तता परीक्षण) किए जाते हैं। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सिखाई गई वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पशु-मुक्त परीक्षण विधियों को व्यापक रूप से अपनाने और इनके बारे में जानकारी बढ़ाने से पशुओं को प्रयोगों से बचाया जा सकता है। साथ ही, इन विधियों से इंसानी शरीर की जैविक प्रक्रियाओं से जुड़े अधिक विश्वसनीय नतीजे भी मिल सकते हैं।
पिछले साल, PETA के वैज्ञानिकों ने 80 प्रतिभागियों के लिए एक महत्वपूर्ण पशु-मुक्त टॉक्सिकोलॉजी प्रशिक्षण कार्यक्रम का सह-आयोजन किया था। इस पहल ने भारत में पशु-मुक्त परीक्षणों के एक नए दौर की शुरुआत करने में मदद की। अब यह प्रयास और आगे बढ़ा है और एक महत्वपूर्ण उपलब्धि तक पहुँचा है।
100 से अधिक प्रतिभागियों ने इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में हिस्सा लिया, जिनमें भारत सरकार के प्रतिनिधि भी शामिल थे। इन कार्यक्रमों में प्रतिभागियों को पशु-मुक्त परीक्षण विधियों का व्यावहारिक अनुभव दिया गया। उन्होंने इंसानों के लिए प्रासंगिक ऐसी पशु-मुक्त विधियों का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण लिया, जिनसे त्वचा में जलन, आँखों में जलन, त्वचा की संवेदनशीलता, प्रकाश-विषाक्तता और साँस से जुड़ी विषाक्तता का आकलन करने के लिए खरगोशों, गिनी पिग, चूहों और अन्य पशुओं के इस्तेमाल की जगह वैकल्पिक तरीके अपनाए जा सकते हैं।
इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में आपसी सहयोग की अहम भूमिका रही। उन्नत इन विट्रो तकनीकों को विकसित करने वाली 2 प्रमुख कंपनियों, MatTek और EPISKIN ने टिशू मॉडल उपलब्ध कराए, ताकि प्रतिभागियों को अत्याधुनिक इन विट्रो विधियों का प्रत्यक्ष अनुभव मिल सके। Corteva के वैज्ञानिकों ने कार्यक्रम में वैज्ञानिक जानकारी और सुझाव दिए, जबकि Colgate-Palmolive ने कुछ प्रतिभागियों के प्रशिक्षण में शामिल होने के लिए उनकी यात्रा का खर्च उठाने में मदद की।
रसायनों के परीक्षण के क्षेत्र में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। भारत पहले ही दुनिया के सबसे बड़े कीटनाशक उत्पादकों और निर्यातकों में से एक है। अब भारत के पास अत्याधुनिक पशु-मुक्त विषाक्तता परीक्षणों के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अग्रणी बनने का अवसर है। इस तरह के प्रशिक्षण से वैज्ञानिकों को पशु-मुक्त परीक्षण विधियों के इस्तेमाल का भरोसा मिलता है। इससे कंपनियों द्वारा इन विधियों को अपनाने और नियामक संस्थाओं द्वारा इन्हें मंज़ूरी दिए जाने की संभावना बढ़ती है।
हाल ही में प्रकाशित एक शोधपत्र में, जिसे PETA इंडिया के एक वैज्ञानिक ने सह-लेखन किया है, बताया गया है कि भारत कीटनाशकों के परीक्षण में पशु-मुक्त विधियों को अपनाने की प्रक्रिया कैसे तेज़ कर सकता है। इसमें बताया गया है कि पशुओं पर किए जाने वाले परीक्षणों में बहुत समय और संसाधन लगते हैं और वे इंसानी शरीर पर होने वाले प्रभावों का भरोसेमंद अनुमान भी नहीं देते। शोधपत्र में पशु-मुक्त विधियों को नियामक मंज़ूरी दिलाने के लिए कुछ व्यावहारिक उपाय भी बताए गए हैं। इनमें स्वीकृत पशु-मुक्त विधियों के बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश उपलब्ध कराना, नियामक संस्थाओं और उद्योगों के बीच बातचीत के अवसर बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत पशु-मुक्त विधियों का इस्तेमाल शामिल है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए, PETA इंडिया के वैज्ञानिक नियामक संस्थाओं के साथ लगातार बातचीत कर रहे हैं और कीटनाशकों की सुरक्षा जाँच में पशु-मुक्त तरीकों को अपनाने के लिए प्रस्ताव भी दे रहे हैं।
पशुओं पर होने वाले और भी अधिक प्रयोगों को रोकने में आप कैसे मदद कर सकते हैं
पिछले 10 वर्षों में, इंसानों के लिए प्रासंगिक और भरोसेमंद पशु-मुक्त परीक्षण विधियों ने विषाक्तता परीक्षण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाया है। लेकिन अभी बहुत काम करना बाकी है। सभी जीवों के हित में अत्याधुनिक वैज्ञानिक तरीकों को बढ़ावा देने के लिए PETA इंडिया की मुहिम से जुड़ें।
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