PETA इंडिया और आश्रय फाउंडेशन के ‘बंदरों के झुंड’ ने भारतीय प्रजाति के बंदरों (रीसस मकाक) को दोबारा कानूनी संरक्षण देने की मांग की
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 (WPA) के तहत 50 से अधिक वर्षों से भारतीय प्रजाति के बंदरों (रीसस मकाक Macaca mulatta) को प्राप्त संरक्षण हटाए जाने के बाद, PETA इंडिया और आश्रय फाउंडेशन के समर्थक शुक्रवार को जंतर मंतर पर बंदरों के मुंह वाले विशाल मुखौटे और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (PPE) किट पहनकर एकत्र हुए, ‘बंदरों’ के इस समूह पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने भारतीय प्रजाति के बंदरों (रीसस मकाक्) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत पुनः उचित रूप से संरक्षित प्रजाति का दर्जा देने और उन्हें अनुसूची-I के अंतर्गत वह सर्वोच्च संरक्षण प्रदान करने की मांग की, जो कई अन्य स्वदेशी प्रजातियों को प्राप्त है। वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के बाद रीसस मकाकों को WPA की अनुसूची-II से हटाए जाने से उनके कल्याण को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न हुई हैं।
PETA इंडिया ने प्रधानमंत्री श्री मोदी जी को एक पत्र भेजकर उन सबूतों को लेकर चिंता व्यक्त की है, जिनसे संकेत मिलता है कि कुछ अनैतिक विदेशी बंदर आयातक प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल किए जाने हेतु भारतीय प्रजाति के बंदरों को पकड़ने की योजना बना रहे थे। वास्तव में, वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (WCCB) द्वारा 11 मई 2022 को जारी एक कार्यालय ज्ञापन में यह उल्लेख किया गया था कि लेबोरेटरी कॉरपोरेशन ऑफ अमेरिका होल्डिंग्स द्वारा प्रयोगों में इस्तेमाल के लिए भारत से संवेदनशील जीवित बंदरों के निर्यात के संभावित प्रयास किए जा सकते हैं। इसके जवाब में, WCCB ने भारत से प्राइमेट्स के अवैध निर्यात को रोकने के लिए अपनी क्षेत्रीय इकाइयों को सतर्क किया था।
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पिछले वर्ष मार्च में, PETA इंडिया ने वाइल्डलाइफ SOS, RESQ चैरिटेबल ट्रस्ट, कंजर्वेशन एक्शन ट्रस्ट, वाइल्डलाइफ वेलफेयर एसोसिएशन और फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशन्स सहित 30 अन्य वन्यजीव एवं पशु संरक्षण समूहों के साथ मिलकर माननीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव जी को एक पत्र भेजा था, जिसमें रीसस मकाकों को WPA के तहत पुनः संरक्षण प्रदान करने और वास्तव में उन्हें अनुसूची-I के अंतर्गत वह सर्वोच्च संरक्षण देने का आग्रह किया गया था, जो कई अन्य स्वदेशी प्रजातियों को प्राप्त है। पिछले वर्ष मई में, 60 से अधिक प्रमुख प्राइमेट वैज्ञानिकों और वन्यजीव विशेषज्ञों ने भी PETA इंडिया के साथ मिलकर मंत्री श्री भूपेन्द्र यादव जी को इसी प्रकार की अपील वाला पत्र भेजा था।
पिछले वर्ष नवंबर में, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति ने रीसस मकाक को WPA की अनुसूची-II में पुनः शामिल करने की सिफारिश की थी। PETA इंडिया ने इससे पहले जुलाई 2024 में भी बोर्ड को पत्र लिखा था। हालांकि, आज तक इस संबंध में कोई परिणामी कार्रवाई नहीं की गई है।
हिंदू धर्म में पूजनीय होने के अतिरिक्त, रीसस मकाक फल व अन्य बीजों को यहाँ वहाँ फैलाकर स्थानीय पारिस्थितिक तंत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वे अक्सर फलों का सेवन करते हैं, और उनकी अनुपस्थिति वनों के लिए हानिकारक हो सकती है। वन्यजीव व्यापारियों द्वारा उनके प्राकृतिक आवासों से पकड़े गए बंदरों को अक्सर छोटी लकड़ी की पेटियों में भर दिया जाता है और विमानों के अंधेरे कार्गो एवं भयावह कार्गो होल्ड में रखकर 30 घंटे के लंबे सफर तक ले जाया जाता है। पकड़ने और परिवहन के दौरान होने वाला तनाव उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकता है, जिससे भारत और दुनिया भर में पशुजनित रोगों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। प्रयोगशालाओं में बंदरों को आमतौर पर छोटे धातु के पिंजरों में अकेले कैद रखा जाता है और उन पर ऐसे प्रयोग किए जाते हैं जिनमें उनके शरीर को चीर दिया जाता है, उन्हें जहर दिया जाता है, अपंग बनाया जाता है, नशीली दवाओं का आदी बनने के लिए मजबूर किया जाता है, बिजली के झटके दिए जाते हैं और अंततः उन्हें मार दिया जाता है। रीसस मकाकों का सड़क के किनारे खेल-तमाशा या करतब दिखाने के लिए और पालतू पशु के रूप में भी शोषण किया जाता है, तथा उन्हें मांस के लिए भी मार दिया जाता है।
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