फिल्मी सितारों, विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, वैज्ञानिकों, पशु चिकित्सकों, NGO और 18,000 से अधिक लोगों ने पशुओं पर प्रयोग के प्रस्तावित नियमों के खिलाफ एकजुट होकर उठाई आवाज़
जॉन अब्राहम, तब्बू, हेमा मालिनी, रवीना टंडन, शिल्पा शेट्टी, क्रिकेटर केएल राहुल, जैकलीन फर्नांडिस, डायना पेंटी, रूपाली गांगुली, ज़हरा एस. खान, राहुल खन्ना, दिया मिर्ज़ा, हर्षवर्धन राणे, पलक तिवारी और वामिका गब्बी ने भारत में पशुओं पर प्रयोग से जुड़े प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की मांग करते हुए एक याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों के कई सांसदों ने भी इस मांग का समर्थन किया है। इनमें लोकसभा सांसद हेमा मालिनी, राज्यसभा सांसद सुलता देव, लोकसभा सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद और पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं राज्यसभा सांसद रेणुका चौधरी शामिल हैं। इन सभी ने प्रस्तावित नियमों को लेकर याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं, संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखे हैं या सार्वजनिक रूप से अपनी चिंता व्यक्त की है। इसके अलावा, भारत और अन्य देशों के 100 से अधिक वैज्ञानिकों, 100 से अधिक पशु चिकित्सकों और भारत के 60 से अधिक पशु संरक्षण संगठनों ने भी इन प्रस्तावित नियमों को मौजूदा स्वरूप में वापस लेने की मांग का समर्थन किया है। PETA इंडिया की वेबसाइट के माध्यम से 18,000 से अधिक लोगों ने भी इसी मांग के समर्थन में याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं।
यह व्यापक विरोध PETA इंडिया, पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी और कई अन्य लोगों द्वारा प्रस्तावित पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला में पशुओं पर प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण एवं निगरानी) नियम, 2026 को लेकर जताई गई गंभीर चिंताओं के बाद सामने आया है। यदि इन नियमों को मौजूदा स्वरूप में अधिसूचित किया जाता है, तो प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल किए जाने वाले पशुओं को मिलने वाली मौजूदा सुरक्षा कमजोर हो सकती है। यह ऐसे समय में हो रहा है, जब भारत सहित दुनिया के कई देश पशुओं पर प्रयोग किए बिना आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहे हैं।
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PETA इंडिया ने चेतावनी दी है कि प्रस्तावित नियमों से प्रयोगों के लिए संरक्षित वन्यजीवों को अधिक संख्या में पकड़ने और उनका इस्तेमाल करने का रास्ता खुल सकता है। कुछ निर्धारित परिस्थितियों में सड़कों और समुदायों के बीच रहने वाले कुत्तों और बिल्लियों को भी प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल करने की अनुमति मिल सकती है। इसके अलावा, इन नियमों के तहत ऐसे प्रयोग भी जारी रह सकते हैं जिनमें पशुओं को असहनीय दर्द और तकलीफ झेलनी पड़ती है। इनमें ऐसे बिजली के झटके देना, जिनसे बचने का कोई रास्ता न हो, जानबूझकर ट्यूमर पैदा करना और ऐसे विषाक्तता परीक्षण शामिल हैं जिनमें पशु की मृत्यु को परीक्षण का अंतिम परिणाम माना जाता है। प्रस्तावित नियम कई प्रयोगों पर ‘पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण एवं निगरानी के लिए गठित केंद्रीय समिति’ (CCSEA) की सीधी निगरानी भी कम कर देंगे। इसके अलावा, पशुओं के कल्याण से जुड़े कई अन्य महत्वपूर्ण मौजूदा सुरक्षा प्रावधानों, जैसे बेहोश करने (एनेस्थीसिया), इच्छामृत्यु और पुनर्वास से संबंधित स्पष्ट नियमों को भी बरकरार नहीं रखा गया है।
भारत पहले ही पशुओं पर प्रयोगों के विकल्पों को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठा चुका है। वर्ष 2014 में देश ने सौंदर्य प्रसाधनों के परीक्षण के लिए पशुओं के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद, नई औषधियाँ और क्लिनिकल परीक्षण (संशोधन) नियम, 2023 के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से उन्नत और मानव स्वास्थ्य के लिए प्रासंगिक परीक्षण विधियों को भी स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने भी देशभर के 71 संस्थानों और प्रयोगशालाओं में पशुओं पर प्रयोग किए बिना अनुसंधान करने वाली 109 परियोजनाओं का समर्थन किया है। इनमें ऑर्गन-ऑन-चिप तकनीक, त्रि-आयामी (3D) ऊतक मॉडल और कंप्यूटर आधारित अनुसंधान विधियाँ शामिल हैं।
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की नियामक एवं वैज्ञानिक संस्थाएँ भी पशुओं पर प्रयोग किए बिना अनुसंधान की आधुनिक विधियों को तेजी से अपना रही हैं। PETA इंडिया का कहना है कि भारत में बनाए जाने वाले किसी भी नए नियम को देश की अब तक की उपलब्धियों को आगे बढ़ाना चाहिए। इसके लिए पशु कल्याण संबंधी सुरक्षा उपायों को मजबूत करना, स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित करना और पशुओं पर प्रयोगों के बजाय आधुनिक तथा मानव स्वास्थ्य के लिए प्रासंगिक अनुसंधान विधियों को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
PETA इंडिया आम लोगों से भी अपील कर रहा है कि वे इस बढ़ती मुहिम का हिस्सा बनें और प्रस्तावित नियमों को वापस लेने की मांग करते हुए 5 नवंबर 2026 तक अपनी आपत्तियाँ और सुझाव संबंधित अधिकारियों को भेजें।
