उत्तरायण से पहले अहमदाबाद में एक विशाल पतंग पर ‘घायल पक्षी’ ने लोगों से पक्षियों के बारे में सोचने की अपील की
उत्तरायण (14 जनवरी) से ठीक पहले, PETA इंडिया के एक समर्थक “खून से लथपथ” पक्षी की वेशभूषा में और “कांच का लेप चड़े मांझे” में उलझा हुआ जमीन पर एक विशाल पतंग पर लेटकर जिस पर लिखा था “कांच लेपित मांझा पक्षियों के लिए जानलेवा है” और “कृपया घातक मांझे को ना कहें!” इस प्रदर्शन का उद्देश्य लोगों में यह जागरूकता फैलाना था कि कांच और धातु के लेप से लेपित सूती धागे, साथ ही नायलॉन मांझा, हर साल हजारों पक्षियों और कई इंसानों के घायल होने और मरने का कारण बनते हैं। साथ ही, हम आम जनता से अपील करते हैं कि पतंगबाज़ी के दौरान वे इन खतरनाक डोरों का उपयोग न करें, ताकि पतंगबाज़ी सभी के लिए सुरक्षित और आनंददायक बनी रहे।

मांझा इंसानों और पक्षियों दोनों के लिए हानिकारक है और उन्हें गंभीर रूप से चोटिल करता है उनकी जान भी लेता है। पतंगबाज़ी में साधारण सूती डोर या सड्डी का इस्तेमाल करके हर कोई इन दर्दनाक चोटों और दुखद मौतों को रोकने में मदद कर सकता है। हम सभी से अपील करते हैं कि उत्तरायण को सभी के लिए खुशी का अवसर बनाने के लिए मांझे को ना कहें।
हर तरह का तीखा माँजा इंसानों, अन्य पशुओं और पर्यावरण के लिए खतरनाक हैं। कांच के पाउडर और धातु से मजबूत की गई रेज़र जैसी तीखी धार वाली डोरें पक्षियों की आबादी पर विनाशकारी प्रभाव डालती हैं, जिनमें गिद्ध जैसी संकटग्रस्त प्रजातियाँ भी शामिल हैं। मांझे से अक्सर पक्षियों के पंख और पैर बुरी तरह कट जाते हैं या पूरी तरह अलग हो जाते हैं। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कई पक्षी छिप जाते हैं, जिससे बचावकर्मी उनकी मदद नहीं कर पाते और बहुत से पक्षी खून बहने से मर जाते हैं। मुख्य वन्यजीव संरक्षक (चीफ कंजरवेटर ऑफ वाइल्डलाइफ) द्वारा जारी आँकड़े गुजरात में उत्तरायण के दौरान पतंगबाज़ी से होने वाले भारी नुकसान को उजागर करते हैं। केवल पिछले साल ही पतंग की डोर और मांझे की वजह से 17,065 पक्षी घायल हुए। लगातार बचाव और पशु-चिकित्सा प्रयासों के बावजूद, 1,493 पक्षियों की चोटों के कारण मौत हो गई।
मांझा बेवजह इंसानों की जान भी ले रहा है। केवल 2025 में ही देशभर में कई मौतें दर्ज की गई हैं। इनमें गुजरात में उत्तरायण के जश्न के दौरान मांझे या पतंग की डोर से गला कटने के कारण छह लोगों की मौत शामिल है, जिनमें पाँच साल का एक बच्चा भी था। इसके अलावा दिल्ली में 22 वर्षीय एक युवक और ड्यूटी के दौरान शहीद हुआ उत्तर प्रदेश पुलिस का 30 वर्षीय सिपाही भी मांझे का शिकार बने। अगर पतंगबाज़ी में तीखे माँजे के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई तो आगे भी ऐसी और चोटें व मौतें होना तय है, लेकिन लोग माँजे का इस्तेमान ना करने का निर्णय लेकर ऐसी घटनाओं को रोक सकते हैं।
इंसानों और अन्य पशुओं के लिए गंभीर खतरे के अलावा, मांझा पर्यावरण के लिए भी बेहद नुकसानदेह है। नायलॉन तथा कांच और धातु से लेपित इस तीखी डोर का इस्तेमाल बढ़ती प्रदूषण समस्या को और गंभीर बनाता है, क्योंकि ये डोरे कई वर्षों तक पर्यावरण में मौजूद रहती हैं। इसके अलावा, ऐसी डोरें बिजली की तारों में उलझकर बिजली आपूर्ति बाधित कर सकती हैं, जिससे एक ही लाइन में खराबी आने पर 10,000 तक लोग प्रभावित हो सकते हैं।
2024 में, PETA India की अपील के बाद, केंद्र सरकार की वैधानिक संस्था एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी प्रकार के मांझे पर प्रतिबंध लगाने और पतंग उड़ाने के लिए केवल साधारण सूती डोर की अनुमति देने की सलाह दी थी। इसके बाद चंडीगढ़, दिल्ली, गोवा, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पंजाब, तेलंगाना और त्रिपुरा की सरकारों ने भी इसी तरह के निर्देश जारी किए हैं।
माँझे पर प्रतिबंध लगवाने में मदद करें!
