‘वर्ल्ड मिल्क डे’ पर PETA इंडिया का बिलबोर्ड सन्देश : “अगर आप कुत्ते का दूध नहीं पीते, तो फिर दूसरी प्रजाति का दूध क्यों पीते हैं?”
‘वर्ल्ड मिल्क डे’ (1 जून) से पहले, पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया ने अहमदाबाद, बैंगलूरु, भोपाल, चेन्नई, मुंबई और नोएडा शहरों में एक साहसिक और सोच को झकझोर देने वाला वीगन बिलबोर्ड जारी किया है, जिस पर लिखा है, “अगर आप कुत्ते का दूध नहीं पीते, तो किसी और प्रजाति का दूध क्यों पीते हैं?” इस विज्ञापन के माध्यम से लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित किया गया है कि क्या इंसानों द्वारा किसी अन्य पशु माँ से आया दूध पीना नैतिक या आवश्यक है। यह विज्ञापन गुजरात के आनंद में कुछ स्थानीय साइट मालिकों द्वारा रोक दिया गया, जिन्होंने इसे Amul के पास लगाने से इंकार कर दिया। PETA इंडिया लंबे समय से Amul से आग्रह कर रहा है कि वह भी पेड़-पौधों पर आधारित दूध और वीगन खाद्य उत्पादों के क्षेत्र में कदम रखे, जैसा कि Danone, Nestlé, इंडिया का NOTO और कई अन्य प्रमुख डेयरी ब्रांड पहले ही कर चुके हैं।
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The Chennai billboard is located at OMR Road, Kazhipattur, Chennai, Tamil Nadu, 603103.
The Bhopal billboard is located at Rani Kamlapati Station Entry / Exit, ISBT – Habibganj Naka Road, Bhopal, 462016.
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The Ahmedabad billboard is located at Krishnakunj Society, Maninagar, Ahmedabad, Gujarat, 380008.
गायों और भैंसों को जबरन गर्भवती करना, उनके बच्चों को चुराना और उनके बच्चों के लिए बने दूध को पीना, इन सबमें कोई प्राकृतिक बात नहीं है। PETA इंडिया के बिलबोर्ड पर यह साफ-साफ कहा गया है कि जो लोग कुत्तों का दूध पीने के विचार से घृणा करते हैं, उन्हें यह सवाल पूछना चाहिए कि वे दूसरे पशुओं का दूध पीने को सही क्यों मानते हैं और वीगं जीवनशैली क्यूँ नहीं चुनते ?
भारत में डेयरी उद्योग ही मांस उद्योग के लिए गायों और भैंसों का सबसे बड़ा स्रोत है। वर्तमान में, अधिकांश गायों और भैंसों को दूध उत्पादन के लिए एक फैक्ट्री जैसे वातावरण में पाला जाता है और उन्हें बार-बार कृत्रिम रूप से गर्भवती किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान कर्मी एक हाथ पशु के मलद्वार में डालते हैं और एक धातु की छड़ के माध्यम से बैल का वीर्य उनके जननांगों में जबरन डाला जाता है, जो उनके लिए एक प्रकार का यौन शोषण होता है। नर बछड़ों का डेयरी उद्योग में कोई आर्थिक मूल्य नहीं होता, इसलिए उन्हें अक्सर भूखा मरने के लिए छोड़ दिया जाता है या फिर उनके मांस और चमड़े के लिए बेच दिया जाता है। मादा बछड़ों को भी वही जीवन मिलता है जो उनकी माताओं ने झेला होता है। उनका इस्तेमाल केवल दूध निकालने के लिए किया जाता है, जब तक कि उनका शरीर पूरी तरह टूट न जाए। इसके बाद उन्हें या तो सड़कों पर बेसहारा छोड़ दिया जाता है या फिर सस्ते मांस के लिए मरने के लिए भेज दिया जाता है।
पशुओं के प्रति क्रूरता के साथ-साथ, डेयरी उत्पादों का सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। विश्व की लगभग 75 प्रतिशत जनसंख्या, जिसमें अधिकांश भारतीय भी शामिल हैं, लैक्टोज इंटोलेरेन्स (लैक्टोज़ न पचा पाना) जैसी बीमारी से प्रभावित है। गायों और भैंसों के दूध में वसा की मात्रा अधिक होती है, यह एक आम धारणा है लेकिन वास्तव में इसका संबंध मोटापे, मधुमेह और कई प्रकार के कैंसर जैसी बीमारियों से पाया गया है।
‘गुड फ़ूड इंस्टीट्यूट इंडिया’ के अनुसार, “पेड़-पौधों पर आधारित दूध के बारे में उपलब्ध आंकड़े काफी आशाजनक हैं। साल 2021 में पेड़-पौधों पर आधारित डेयरी उत्पादों का बाज़ार लगभग 250 करोड़ रुपये का था, और 2025 तक इसके 891 करोड़ रुपये तक पहुँचने की उम्मीद है। 2030 तक यह बाज़ार 4,827 करोड़ रुपये से लेकर 10,625 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, 2030 तक भारत इस क्षेत्र में 459 करोड़ रुपये से लेकर 1,889 करोड़ रुपये तक का निर्यात भी कर सकता है। इस श्रेणी में 45 से ज़्यादा ब्रांड और 223 से अधिक उत्पाद शामिल हैं, जिनमें दूध, दही, मक्खन, चीज़ और दूसरे पेड़-पौधों पर आधारित विकल्प मौजूद हैं। यह श्रेणी भारत में पेड़-पौधों पर आधारित खाने-पीने की चीज़ों में सबसे ज़्यादा विकसित और आगे बढ़ी हुई मानी जाती है।”
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