‘बाघ’, ‘ज़ेब्रा’ और ‘जिराफ़’ विश्व शाकाहारी जागरूकता माह के अवसर पर करेंगे अपील: अपने प्राकृतिक आवास बचाएँ – वीगन बनें

Posted on by Immaculate Lakshman

विश्व शाकाहारी जागरूकता माह (अक्टूबर) और विश्व खाद्य दिवस (16 अक्टूबर) के अवसर पर, PETA इंडिया और वीगंस ऑफ तेलंगाना के तीन समर्थक बाघ, ज़ेब्रा और जिराफ़ के रूप में अपने शरीर पर रंगों से पेंट करवाकर शुक्रवार को हैदराबाद में एकत्र हुए। उनके हाथों में ऐसे संदेशों वाले पोस्टर थे जिन पर लिखा था “मांस खाना प्रजातियों के विलुप्त होने में योगदान देता है – वीगन भोजन अपनाएँ” और “मांस उत्पादन के लिए जंगल नष्ट किए जाते हैं – वीगन बनें।” इस आकर्षक प्रदर्शन के ज़रिए उन्होंने राहगीरों को  बताया कि शाकाहारी भोजन चुनना अच्छा है, लेकिन वीगन भोजन अपनाना उससे भी बेहतर है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मांस, अंडों और डेयरी उत्पादों के लिए पशुओं को पालना उन प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने के सबसे बड़े कारणों में से एक है, जहाँ विभिन्न प्रजातियाँ रहती हैं। यह जैव विविधता के नुकसान और प्रजातियों के विलुप्त होने का भी एक प्रमुख कारण है। इससे इंसानों की खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है, क्योंकि दुनिया की कुल खेती योग्य ज़मीन का एक-तिहाई हिस्सा ऐसे पशुओं के लिए चारा उगाने में इस्तेमाल होता है, जिन्हें भोजन के लिए पाला जाता है, जबकि इन फसलों का इस्तेमाल सीधे इंसानों के भोजन के लिए किया जा सकता है।

मांस, अंडों और डेयरी उत्पादों का उत्पादन प्रदूषण, समुद्र में ऐसे मृत क्षेत्र बनने, जहाँ ऑक्सीजन की कमी के कारण जलीय जीवन जीवित नहीं रह पाता, ज़मीन के इस्तेमाल से प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने और प्रजातियों के विलुप्त होने के प्रमुख कारणों में शामिल है। इस उत्पादन में दुनिया के एक-तिहाई मीठे पानी के संसाधनों का इस्तेमाल होता है और कुछ अनुमानों के अनुसार, इससे दुनिया की सभी परिवहन प्रणालियों के कुल उत्सर्जन से भी ज़्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि वीगन बनने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने भोजन से जुड़े कार्बन फुटप्रिंट को 73% तक कम कर सकता है। इसका मतलब है कि वीगन बनना पृथ्वी पर अपने नकारात्मक प्रभाव को कम करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक हो सकता है।

PETA इंडिया ने अपने वीडियो ‘ग्लास वॉल्स’ (Glass Walls) में दिखाया है कि अंडों के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मुर्गियों को इतने छोटे पिंजरों में बंद रखा जाता है कि वे अपने पंख तक नहीं फैला सकतीं। गायों और भैंसों को वाहनों में इतनी बड़ी संख्या में ठूँसकर ले जाया जाता है कि बूचड़खाने तक पहुँचने से पहले ही अक्सर उनकी हड्डियाँ टूट जाती हैं। इसके बाद उन्हें घसीटकर बूचड़खाने ले जाया जाता है। सूअरों के दिल में चाकू घोंप दिया जाता है, जबकि वे दर्द से चीखते रहते हैं। मछलियों को समुद्रों से निकाल कर नावों की डेक पर रखा जाता है जहां वह दम घुटने से मर जाती हैं या ज़िंदा रहते हुए ही उनके शरीर को काट दिया जाता है। अंडा उद्योग में नवजात नर चूज़ों को, जो अंडे नहीं दे सकते, दूसरे अनचाहे चूज़ों के साथ पीसकर, जलाकर, या ज़िंदा दफना कर मार दिया जाता है। वहीं, डेयरी उद्योग में नर बछडे आगे चलकर दूध नहीं दे पाएंगे इसलिए उनका त्याग कर दिया जाता है, भूखे मरने के लिए छोड़ दिया जाता है या मार दिया जाता है। भारत चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से ही मांस-मुक्त भोजन के ज़रिए दुनिया को पशुओं और पर्यावरण के प्रति दयालु होने की प्रेरणा देता आया है।

आज भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मांस-मुक्त आबादी है, जबकि 10% भारतीय खुद को वीगन मानते हैं। वीगन बनने वाला प्रत्येक व्यक्ति हर साल लगभग 200 पशुओं तक की जान बचाने में मदद करता है और हृदय रोग, मधुमेह तथा कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम भी कम कर सकता है।

पृथ्वी की रक्षा करें, वीगन बनें