चूहों को जबरन खिलाया गया इंसानी मल: PETA इंडिया ने “ओरियो” बनाने वाली कंपनी Mondelēz से पशु परीक्षण बंद करने की माँग करी

Posted on by Erika Goyal

PETA इंडिया ने “ओरियो” बिस्किट बनाने वाली कंपनी Mondelēz को एक पत्र भेजकर अपील की है कि वह ऐसे पशु परीक्षणों को हमेशा के लिए बंद करे जो कानून द्वारा अनिवार्य नहीं हैं। इस अपील में एक ऐसे क्रूर प्रयोग का भी ज़िक्र किया गया है जिसमें चूहों को जबरन इंसानों का मल खिलाया गया था।

हालाँकि Mondelēz ने वर्ष 2018 में PETA US से परामर्श के बाद पशु परीक्षणों पर सीमित वैश्विक रोक लगाने की घोषणा की थी, लेकिन अब भी एक गंभीर खामी के चलते कंपनी “मूल पोषण विज्ञान” को बढ़ावा देने के नाम पर पशुओं पर प्रयोग करती आ रही है। कंपनी का दावा है कि वह केवल वहीं पशु परीक्षण कराती है जहाँ कानून इसकी अनिवार्यता तय करता है, लेकिन रिपोर्ट्स के अनुसार Mondelēz ने कई ऐसे प्रयोगों को आर्थिक सहयोग दिया है जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों की आड़ में चूहों को जबरन इंसानी मल में मौजूद बैक्टीरिया खिलाए गए। इन प्रयोगों से मनुष्यों के स्वास्थ्य से जुड़ी कोई महत्वपूर्ण जानकारी सामने नहीं आई है।

चूहों को जबरन हानिकारक मल-बैक्टीरिया, रसायन और कांच के कण खिलाना पूरी तरह अस्वीकार्य है, और ऐसे प्रयोग जिनका न कोई वैज्ञानिक महत्व है और न कानूनी आधार, बहुत पहले ही प्रतिबंधित हो जाने चाहिए थे। हम Mondelēz से आग्रह करते हैं कि वह पशु परीक्षण को पूरी तरह समाप्त करे और अन्य कई ज़िम्मेदार कंपनियों की तरह PETA के ‘ईट विदाउट एक्सपेरीमेंट्स’ कार्यक्रम से जुड़ जाए जो पहले ही यह सराहनीय कदम उठा चुकी हैं। ऐसे अमानवीय प्रयोगों को जारी रखने या उन्हें फंड करने से कंपनी की ब्रांड छवि को गंभीर नुकसान हो रहा है, और उपभोक्ता अब ऐसे उत्पादों का समर्थन नहीं करना चाहते।

PETA इंडिया और दुनियाभर के खाद्य उत्पादक बेवजह के पशु परीक्षणों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कर रहे हैं

ऐसे सामान्य खाद्य घटक जिनसे कोई विषाक्तता (टॉक्सिसिटी) का खतरा नहीं होता, उनके लिए पशुओं पर परीक्षण करना न केवल अनावश्यक है, बल्कि अब वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गैरजरूरी माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के अध्ययन इच्छुक मानव स्वयंसेवकों के साथ सुरक्षित रूप से किए जा सकते हैं, जिससे पशुओं पर किए जाने वाले प्रयोगों के बजाय अधिक सटीक और मनुष्य-प्रासंगिक नतीजे सामने आते हैं। PETA इंडिया का कहना है कि आज विज्ञान के पास कई आधुनिक और नैतिक विकल्प मौजूद हैं – जैसे इन विट्रो  तकनीकें और कंप्यूटर मॉडल – जिनकी मदद से यह समझा जा सकता है कि खाद्य पदार्थ मानव स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करते हैं।

अब तक 1,28,000 से अधिक उपभोक्ता PETA इंडिया, PETA जर्मनी, PETA यूएस, PETA यूके, PETA फ्रांस, PETA नीदरलैंड्स, PETA ऑस्ट्रेलिया, PETA लातिनो और PETA2 के ऑनलाइन एक्शन अलर्ट्स के ज़रिए Mondelēz से संपर्क कर चुके हैं और पशुओं पर परीक्षणों पर प्रतिबंध की माँग कर चुके हैं। PETA के ‘ईट विदाउट एक्सपेरीमेंट्स’ कार्यक्रम से अब तक 400 से अधिक खाद्य और पेय उत्पाद कंपनियाँ जुड़ चुकी हैं – जिनमें Ferrero और Unilever जैसी बड़ी कंपनियाँ भी शामिल हैं – जिन्होंने यह संकल्प लिया है कि वे कानून द्वारा आवश्यक न होने वाले किसी भी पशु परीक्षण में भाग नहीं लेंगी।

दुनियाभर की खाद्य एजेंसियों का स्पष्ट संदेश: पशु परीक्षण नहीं है स्वीकार्य

Mondelēz द्वारा किए जा रहे पशु परीक्षणों की वैज्ञानिक कमजोरियों को उजागर करते हुए PETA US पहले ही कंपनी को एक विस्तृत वैज्ञानिक समीक्षा भेज चुका है। भारत सरकार द्वारा पारित न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स (संशोधन) नियम, 2023 के तहत अब दवाओं की सुरक्षा और प्रभावशीलता आंकने के लिए गैर-पशु तरीकों को अपनाने की अनुमति दे दी गई है, जिससे पारंपरिक पशु परीक्षणों को पीछे छोड़ा जा रहा है। इसी दिशा में अमेरिका की नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ हेल्थ (NIH) ने भी हाल ही में घोषणा की है कि वह एक नया कार्यक्रम शुरू करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य है – अनुसंधान में पशुओं के उपयोग को कम करते हुए नवाचार आधारित मानवीय विज्ञान को बढ़ावा देना। इसके अलावा, यूरोप की फूड सेफ्टी अथॉरिटी (EFSA), अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA), कनाडा की हेल्थ फूड डायरेक्टोरेट और अन्य प्रमुख संस्थाएँ अब किसी भी खाद्य पदार्थ से जुड़ी स्वास्थ्य-संबंधी दावों की पुष्टि के लिए केवल पशु परीक्षण को प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करतीं।

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