वर्धा में बकरे का सिर काटने के मामले में एफआईआर दर्ज
वर्धा जिले में एक बकरे का सिर काटकर की बलि दिए जाने की जानकारी मिलने के बाद, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स इंडिया (PETA इंडिया) ने स्थानीय कार्यकर्ता गौरव ठाकुर, संस्थापक, एनवायरनमेंटल रेस्क्यू कमेटी, के साथ मिलकर मामले में प्राथमिकी रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करवाई। यह बलि सार्वजनिक रूप से दी गई थी और इसका वीडियो भी बनाया गया। वीडियो में एक व्यक्ति डरे सहमे बकरे के पिछले पैर पकड़े हुए दिखाई देता है, जबकि दूसरा व्यक्ति उस पशु का सिर काट देता है।
तलेगांव पुलिस स्टेशन ने दो आरोपियों, बाबनसिंह संतोषसिंह बावरी और जोनुसिंह गोतंसिंह बावरी, के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 325 और 3(5) तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 3, 11(1)(a) और 11(1)(l) के तहत एफआईआर दर्ज की।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 325 किसी भी पशु को विकलांग बनाने या मारने को संज्ञेय अपराध मानती है और इसके लिए पाँच वर्ष तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों का प्रावधान करती है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11 “क्रूरता” को परिभाषित करती है और किसी भी पशु को अनावश्यक दर्द या पीड़ा पहुँचाना दंडनीय अपराध बनाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि पशुओं को केवल लाइसेंस प्राप्त बूचड़खानों में ही मारा जा सकता है और नगर निकायों को इस आदेश का पालन सुनिश्चित करना होगा। पशु क्रूरता निवारण (बूचड़खाना) नियम, 2001, और खाद्य सुरक्षा और मानक (खाद्य व्यवसायों का लाइसेंस और पंजीकरण) विनियम, 2011, के अनुसार भोजन के लिए पशुओं को केवल उन्हीं लाइसेंस प्राप्त बूचड़खानों में मारा जा सकता है, जहाँ प्रजाति-विशिष्ट बेहोश करने वाले उपकरण उपलब्ध हों।
पशु बलि, पशुओं के प्रति क्रूरता होने के साथ-साथ समाज के लिए भी खतरनाक है। यह हमें हिंसा के प्रति असंवेदनशील बनाती है और ऐसे पुराने विश्वासों को मजबूत करती है जो प्रगति में बाधा डालते हैं। जिस तरह मानव बलि को अब हत्या माना जाता है, उसी तरह अब जब भारत अंतरिक्ष मिशनों की ओर बढ़ रहा है, तो पशु बलि जैसी पुरानी प्रथा को समाप्त होना चाहिए। यह हमारे सामाजिक विकास के लिए आवश्यक है।
