माँस के लिए ‘कुत्ते को भूनकर’ प्रजातिवाद खत्म करने की अपील

Posted on by Surjeet Singh

PETA इंडिया के एक समर्थक ने पुणे में एक ग्रिल पर एक “कुत्ते” को आग पर भून। इस चौंकाने वाले दृश्य ने यह संदेश दिया कि सभी पशु मांस, खून और हड्डियों से बने हैं; हम सभी में दर्द और भावनाओं को महसूस करने की समान क्षमता है; और मांस खाने का मतलब ऐसे संवेदनशील जीवों के शव खाना है, जो अपने जीवन को उतना ही महत्व देते थे जैसे कि कुत्ते देते हैं और मरना नहीं चाहते थे।

PETA इंडिया इस सिद्धांत में विश्वास रखता है कि “पशु हमारे खाने के लिए नहीं हैं।” PETA इंडिया ने “Glass Walls” नामक डॉक्यूमेंट्री में दिखाया है कि भैंसों, बकरियों और भोजन के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अन्य पशुओं को अक्सर इतनी बड़ी संख्या में वाहनों में ठूंस दिया जाता है कि कई पशु रास्ते में गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं या उनकी मौत हो जाती है। उन्हें पीटा जाता है, घसीटा जाता है और आमतौर पर भोजन, पानी और पशु चिकित्सा देखभाल जैसी बुनियादी जरूरतों से भी वंचित रखा जाता है। बूचड़खाने में उन्हें एक-दूसरे के सामने ही मार दिया जाता है और अक्सर उनके होश में रहते हुए ही उनके शरीर के अंग काटे जाते हैं और खाल उतारी जाती है, जिससे वे दर्द महसूस करते रहते हैं।

पशु-आधारित खाद्य पदार्थों का सेवन हृदय रोग, स्ट्रोक, डायबिटीज़, कैंसर और मोटापे से पीड़ित होने के बढ़ते जोखिम से स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, भोजन के लिए पशुओं को पालना दुनियाभर में जल प्रदूषण और भूमि के क्षरण के प्रमुख कारणों में से एक है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि जलवायु संकट के सबसे गंभीर प्रभावों से निपटने के लिए दुनियाभर में वीगन भोजन की ओर बढ़ना जरूरी है।