खून से लथपथ और मारपीट का शिकार : PETA इंडिया ने हिंसक और अवैध भैंस लड़ाइयों की नवीनतम जांच के साथ गौहाटी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की

Posted on by Surjeet Singh

आज सुनवाई के लिए निर्धारित एक मामले में, माघ बिहू के दौरान असम के कई जिलों में भैंसों की लड़ाइयों (मोह जुज) के खुलेआम आयोजन का हवाला देते हुए, PETA इंडिया ने इस वर्ष भैंसों की लड़ाइयों के दौरान भैंसों पर हुई अत्यधिक क्रूरता के चौंकाने वाले नए सबूत गौहाटी उच्च न्यायालय में प्रस्तुत किए हैं। PETA इंडिया ने हुए अवैध आयोजनों के लिए जवाबदेही तय करने और तत्काल कार्रवाई की मांग की है, साथ ही भविष्य में ऐसे किसी भी आयोजन को गौहाटी उच्च न्यायालय के आदेशों और सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय (एनिमल वेल्फेयर बोर्ड बनाम ए. नागराजा) की खुली अवहेलना में होने से रोकने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की अपील की है।

इस वर्ष मोरीगाओं और नागांव में हुए अवैध आयोजनों से एकत्र किए गए दस्तावेजों में PETA इंडिया ने दिखाया कि खून से लथपथ भैंसों को, जिनके शरीर पर गहरे खुले घाव हैं, कार्यक्रमों के दौरान मोटी लाठियों से लगभग लगातार पीटा जाता है और उन्हें लड़ने के लिए मजबूर करने हेतु नाक की रस्सियों से खींचा जाता है, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आती हैं। दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि एक व्यक्ति को भागती हुई भैंस ने बुरी तरह घायल कर दिया।

दिसंबर 2024 में, PETA इंडिया द्वारा दायर याचिकाओं पर कार्रवाई करते हुए, गौहाटी उच्च न्यायालय ने असम सरकार की 27 दिसंबर 2023 की मानक संचालन प्रक्रिया(SOP) को खारिज कर दिया, जिसने वर्ष के एक निश्चित समय (जनवरी में) भैंसों और बुलबुल पक्षियों की लड़ाइयों की अनुमति दी थी। गौहाटी उच्च न्यायालय ने यह भी माना कि यह मानक संचालन प्रक्रिया 7 मई 2014 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय (पशु कल्याण बोर्ड बनाम ए. नागराजा) का उल्लंघन है, जो ऐसे पशु प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाता है जिनमे क्रूरता अंतर्निहित है।

इन स्पष्ट और बाध्यकारी न्यायिक निर्देशों के बावजूद, इस वर्ष की शुरुआत में असम में अवैध भैंस लड़ाइयों का आयोजन किया गया वह भी प्रशासन की नाक के नीचे PETA इंडिया ने पहले ही संबंधित जिला और पुलिस अधिकारियों को कई लिखित शिकायतें दी थीं, जिस में चेतावनी दी थी कि ये आयोजन वैधानिक कर्तव्यों का खुला उल्लंघन और न्यायालय के आदेशों की अवमानना होगी और आयोजकों के खिलाफ अनेक औपचारिक शिकायतें दर्ज कराईं, जिनके परिणामस्वरूप केवल दो प्राथमिकी रिपोर्ट (FIR) शिवसागर और नागांव के गोमोथा पाथर में पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 3 और 11(1)(क), (ल), (म), (न) तथा 22 के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता की धारा 325, 291 और 3(5) के तहत दर्ज की गईं। हालांकि, आहतगुरी, गोर्मोरी गांव, मिकिरभेटा, रोहा, माजरहोला दल पाथर और डिब्रूगढ़ में हुई अवैध लड़ाइयों के संबंध में दी गई शिकायतों पर कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई। जिन मामलों में प्राथमिकी दर्ज भी की गई, उनमें भी कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई; कानून के अनुसार आवश्यक होने के बावजूद पीड़ित पशुओं को जब्त नहीं किया गया।

PETA इंडिया ने दोहराया है कि भैंसें संवेदनशील और शांत स्वभाव के पशु हैं, जो दर्द और पीड़ा महसूस करती हैं और दौड़ना या लड़ना उनके प्रकर्तिक स्वभाव के विपरीत है। PETA इंडिया यह भी बताता है कि ऐसी लड़ाइयाँ स्वभाव से ही क्रूर होती हैं, क्योंकि इनका उद्देश्य ही भाग लेने के लिए मजबूर किए गए पशुओं को अपार पीड़ा और कष्ट देना होता है, और यह अहिंसा और करुणा के सिद्धांतों के विपरीत है, जो भारतीय संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं।

असम में भैंसों को क्रूर लड़ाइयों से बचाएं