PETA इंडिया और 30 वन्यजीव संरक्षण संगठनों ने “रिसस मकाक” (भारतीय प्रजाति के बंदरों) की सुरक्षा पुनः बहाल करने की अपील की
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05 March 2025
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नई दिल्ली – आज सुबह, 10 मार्च को संसद सत्र से पहले, PETA इंडिया और 30 प्रमुख वन्यजीव एवं पशु कल्याण संगठनों ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MOEFCC) को एक पत्र भेजकर “रिसस मकाक” (भारतीय प्रजाति के बंदरों) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972 की अनुसूची II के तहत कानूनी संरक्षण प्रदान करने की पुरानी व्यवस्था को फिर से बहाल करने का अनुरोध किया है। पत्र में PETA इंडिया ने अपील की है कि अन्य स्वदेशी प्रजातियों की तरह रिसस मकाक को भी अनुसूची I के तहत उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान की जाए।
पत्र में यह उल्लेख किया गया कि 2022 में 50 वर्षों तक लागू रहने के बाद इन सुरक्षा उपायों को हटा लिया गया था। यदि यह सुरक्षा फिर से लागू की जाती है, तो “रिसस मकाक” बंदरों को शिकार, प्रयोग, मांस उद्योग या पालतू बनाने के लिए पकड़ने और मारे जाने से बचाया जा सकेगा। इसके साथ ही, यह भी बताया गया कि सुरक्षा हटाने के बाद, “रिसस मकाक” प्रजाति की देखरेख अब अनुभवी वन अधिकारियों के बजाय नगर निगमों और पुलिस विभागों के पास सौंपा गया है, जिनके पास वन्यजीवों का सही तरीके से प्रबंधन करने के लिए आवश्यक ज्ञान और संसाधन नहीं हैं। इसके परिणामस्वरूप अमानवीय व्यवहार, मानव और बंदरों के बीच आपसी संघर्ष घटनाओं में वृद्धि, और सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
सुरक्षा उपायों की कमी के कारण “रिसस मकाक” बंदरों को गंभीर शोषण का सामना करना पड़ सकता है। इन्हें फिर से सड़क पर प्रदर्शन करने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जो कि 1998 से प्रतिबंधित है। इसके अलावा, इन बंदरों को अब उनके प्राकृतिक आवास यानि जंगलों से अवैध रूप से पकड़ा जा सकता है, पालतू पशुओं के अवैध व्यापार के तहत बेचा जा सकता है, सोशल मीडिया पर दिखाने के लिए शोषित किया जा सकता है, वैज्ञानिक प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा सकता है, और यहां तक कि मांस के लिए मारा जा सकता है। हाल ही में एक रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पालतू बंदरों को ऑनलाइन वीडियो में दिखाने के लिए उन्हें शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी जाती हैं, जैसे मारना, जलाना और अंगों को काटना, ताकि दर्शकों से प्रतिक्रिया प्राप्त की जा सके। इसके अतिरिक्त, इन बंदरों को अकेलेपन, कैद और अंत में बेघर छोड़ने की स्थिति का भी सामना करना पड़ता है।
PETA इंडिया की साइंस पॉलिसी एडवाइसर, डॉ. अंजना अग्रवाल ने कहा, “यह बदलाव न केवल ‘रिसस मकाक’ की रक्षा के लिए वर्षों की मेहनत और संघर्ष को खत्म कर देता है, बल्कि इन पशुओं को क्रूरता और शोषण का शिकार होने के लिए बिल्कुल असुरक्षित भी छोड़ देता है। ‘रिसस मकाक’ की सुरक्षा हटाना इनके साथ अन्याय है, जो इन बंदरों के भविष्य को अंधकार में डालता है। यह संयुक्त पत्र PETA इंडिया के अभियान का एक महत्वपूर्ण कदम है, ताकि हम नीति निर्माताओं पर दबाव बना सकें कि वह इन बंदरों के साथ हो रही नाइंसाफी में सुधार कर सकें।“
रिसस मकाक का स्वभाव बेहद सामाजिक और दिल छूने वाला होता है। ये बड़े और जीवंत समूहों में रहते हैं, अपनी माताओं के दूध का सेवन करते हैं, और पेड़ों पर छादन और तैरने जैसी गतिविधियों का आनंद लेते हैं। हिंदू धर्म में इन्हें विशेष सम्मान और श्रद्धा दी जाती है, और ये फलों के बीजों को यहाँ वहाँ फैलाकर लोकल इको सिस्टम बनाए रखने में मददगार होते हैं, उनके फैलाए बीजों से वन जंगल का प्रसार बना रहता है। इनकी अनुपस्थिति से न केवल जंगलों पर गहरा असर पड़ेगा, बल्कि यह प्रकृति के सौंदर्य और संतुलन को भी नुकसान पहुंचा सकता है। इन पशुओं की रक्षा करना न सिर्फ हमारी जिम्मेदारी है, बल्कि यह पूरे इको सिस्टम की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।
प्रयोगशालाओं में, जो पहले ही एशिया में रिसस मकाक बंदरों के जंगलों को तबाह कर चुका है, इन बंदरों को बेरहमी से जंगलों से पकड़ लिया जाता है, उन्हें तंग और छोटे लकड़ी के बक्सों में ठूस दिया जाता है, और फिर 30 घंटे तक विमानों के अंधेरे और डरावने कार्गो बॉक्स में डालकर विदेशों में परिवहित किया जाता है जहां उन्हें न सिर्फ अनेकों शारीरिक यातनाओं का सामना करना पड़ता है, बल्कि मानसिक यातनाएं भी मिलती हैं। इस कष्टप्रद यात्रा के कारण इन बंदरों का तनाव बढ़ता है, जिससे उनका शारीरिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, जो न केवल भारत, बल्कि पूरी दुनिया में स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकता है। प्रयोगशालाओं में इन बंदरों को अकेला रखा जाता है, और उन पर भयानक अत्याचार किए जाते हैं, जैसे उन्हें उनके अंग काटना, जहर देना, अपाहिज करना, नशे की लत लगाना, बिजली के करंट देना, और अंततः उन्हें मौत के घाट उतार देना।
PETA इंडिया जो इस धारणा में विश्वास रखता है कि “पशु मनुष्यों द्वारा शोषित होने के लिए नहीं है”, प्रजातिवाद का विरोध करता है क्योंकि यह एक ऐसी विचारधारा है जिसमें मनुष्य इस संसार में स्वयं को सर्वोपरि मानकर अन्य समस्त प्रजातियों का शोषण करना अपना अधिकार समझता है।
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