जीत! चिटकारा विश्वविद्यालय में जीवों पर क्रूर तैराकी परीक्षणों पर प्रतिबंध

Posted on by Surjeet Singh

PETA इंडिया द्वारा जबरन तैराकी परीक्षण की क्रूरता और वैज्ञानिक अमान्यता के बारे में सूचित करने के बाद, चिटकारा यूनिवर्सिटी ने पुष्टि की है कि वह अब अपने संस्थान में इस परीक्षण की अनुमति नहीं देगा।

इंसानों को होने वाले डिप्रेशन (अवसाद) पर प्रकाश डालने के लिए, जबरन तैराकी परीक्षण में चूहों, हैम्स्टर और अन्य छोटे जीवों को परीक्षण पदार्थ दिए जाते हैं, फिर उन्हें पानी से भरे ऐसे बीकर (गिलासनुमा कांच के बर्तन) में डाल दिया जाता है जिनसे बाहर निकलना नामुमकिन होता है, स्वयं को डूबने से बचाने और पानी से बाहर निकलने की हताशा में यह नन्हें जीव छटपटाते हैं और लगातार तैरते रहते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा इस प्रयोग की कड़ी आलोचना की गई है। उनका तर्क हैं कि इन जीवों का हार मानकर तैरना छोड़ देना अवसाद या निराशा का संकेत नहीं है, बल्कि ऊर्जा बचाने और नई परिस्थिति में स्वयं को ढालने का सूचक मात्र है। शोध बताते हैं कि एंटीडिप्रेसेंट दवाओं की प्रभावशीलता जाँचने के लिए इस तरह के परीक्षण सिक्का उछाल कर परिणाम तय करने जितने विश्वसनीय मात्र हैं।

“हमारा संस्थान नैतिक अनुसंधान प्रथाओं, नियामक अनुपालन और राष्ट्रीय दिशानिर्देशों तथा विकसित हो रहे वैज्ञानिक मानकों के साथ निरंतर तालमेल बनाए रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। [फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया] की अधिसूचना के अनुरूप, हमने सुनिश्चित किया है कि जबरन तैराकी परीक्षण को भविष्य की किसी भी शैक्षणिक या अनुसंधान गतिविधि के लिए न तो विचार किया जाएगा और न ही स्वीकृत किया जाएगा।”
-डॉ. ठाकुर गुरजीत सिंह, फेसर एवं डीन, चिटकारा कॉलेज ऑफ फार्मेसी  

PETA इंडिया के प्रयासों के बाद, फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया ने अप्रैल में अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी संस्थाओं जिनमें चिटकारा विश्वविद्यालय भी शामिल है, को व्यापक रूप से खारिज किए गए इस प्रयोग के निरंतर उपयोग की समीक्षा करने और आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

दुनिया भर के अन्य सरकारी एजेंसियाँ, विश्वविद्यालय और फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ, PETA संगठनों के अनुरोध के बाद जबरन तैराकी परीक्षण की अनुमति देने, करने या स्पॉन्सर करने से इनकार करने का वचन दे चुकी हैं। PETA इंडिया, पशु प्रयोगों के नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण के लिए गठित समिति (CCSEA) से राष्ट्रीय स्तर पर इस क्रूर प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए अपने प्रयासों को तेज कर रहा है।

हमारे कार्यों का समर्थन करें