कंबाला में क्रूरता पर रोक लगाने के लिए PETA इंडिया ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया, राज्य को सौंपी जाँच की नई रिपोर्ट
कर्नाटक के भैंस दौड़ आयोजनों की हालिया जाँच के बाद, पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स, इंडिया (PETA इंडिया) ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है, जिसमें कर्नाटक उच्च न्यायालय के 14 नवंबर के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसने दक्षिण कन्नड़ और उडुपी के तटीय जिलों के बाहर हिंसक भैंस दौड़ों (जिन्हें अक्सर “कंबाला” के रूप में प्रचारित किया जाता है) की अनुमति दी थी। PETA इंडिया का कहना है कि उच्च न्यायालय का यह निष्कर्ष कि ऐसे आयोजन “पूरे राज्य” की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, कानून की गलत व्याख्या करता है, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (PCA) 1960 में दी गई सीमित छूट को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है, और “परंपरा” के नाम पर पशुओं पर क्रूरता के व्यावसायीकरण का रास्ता खोलता है। PETA इंडिया ने 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में आयोजित विभिन्न कंबाला आयोजनों में भैंसों को लकड़ी की लाठियों से बेरहमी से पीटे जाने, नाक की रस्सियों से खींचे जाने, गिरने और उनके शरीर पर दिखाई देने वाले घावों के नए वीडियो और फोटोग्राफिक सबूत भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री सिद्धारमैया जी को सौंपे हैं और उनसे राज्य में इन हिंसक प्रदर्शनों को पूरी तरह समाप्त करने का आग्रह किया है। इन आयोजनों की जाँच रिपोर्ट भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई है।
PETA इंडिया की SLP में कहा गया है कि PCA अधिनियम 1960, जिसे कर्नाटक द्वारा संशोधित किया गया है, केवल “कंबाला” और “बैल/बैलगाड़ी दौड़” के लिए सीमित और सशर्त छूट प्रदान करता है, जब वे “आमतौर पर परंपरा और संस्कृति के हिस्से के रूप में आयोजित किए जाते हैं”, जो ऐतिहासिक रूप से कुछ चुनिंदा तटीय जिलों से जुड़ा एक तथ्यात्मक संदर्भ है। इसलिए बेंगलुरु या शिवमोग्गा जैसे गैर-पारंपरिक शहरों में आयोजित दौड़ PCA अधिनियम के तहत निषिद्ध रहती हैं और AWBI बनाम भारत संघ (2023) तथा ए. नागराजा (2014) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का उल्लंघन करती हैं। इस बीच, 2023 में PETA इंडिया द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दायर की गई समीक्षा याचिका, जिसमें कंबाला और इसी तरह के आयोजनों पर पूर्ण प्रतिबंध बहाल करने की मांग की गई थी, अभी भी लंबित है।
PETA इंडिया द्वारा हाल के विभिन्न आयोजनों से एकत्र किए गए वीडियो फुटेज में देखा गया है कि इन आयोजनों में उपयोग किए जाने वाले भैंसों को दर्द और पीड़ा देकर नियंत्रित किया जाता है। उनकी संवेदनशील नासिका झिल्ली में डाली गई मोटी नाक की रस्सियों से उन्हें हिंसक तरीके से खींचा जाता है, थप्पड़ मारे जाते हैं, नुकीले हथियार चुभोये जाते हैं और अन्य सख्त हथियारों से बार-बार पीटा जाता है। कई भागने की कोशिश करते हैं, गिर जाते हैं या सांस लेने के लिए संघर्ष करते हैं। आयोजनों के दौरान देखे गए अनेक भैंसों के मुंह से झाग निकलता देखा गया, जो थकावट और गर्मी के तनाव का संकेत है, जबकि अन्य के शरीर पर मार से बने खुले निशान दिखाई दिए। भैंस ऐसे पशु हैं जो स्वभाव से अफरातफरी से दूर रहते हैं फिर भी दौड़ों के दौरान उन्हें तेज शोर, भीड़भाड़ और तेज रोशनी वाले वातावरण में धकेल दिया जाता है, जहां अपने मनोरंजन के लिए उन्हें डर और पीड़ा देकर उनका शोषण किया जाता है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय और अब सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत PETA इंडिया के साक्ष्यों में 2023 बेंगलुरु भैंस दौड़ों के निष्कर्ष भी शामिल हैं, जहां तटीय भैंसों को लंबी दूरी तक दुख भरे परिवहन, कोड़ों की मार, और लंबी दौड़ वाली पटरियों पर चलना पड़ा। यह आयोजन अत्यधिक व्यावसायिक प्रकृति का था और सांस्कृतिक प्रथा के बजाय मनोरंजक मेले के रूप में आयोजित किया गया था। आयोजन स्थल पर कॉर्पोरेट प्रायोजन प्रमुख रूप से प्रदर्शित किए गए थे, जिनमें फ्लडलाइट टावरों और रेस स्क्रीन पर भी शामिल थे, जबकि लग्जरी कार ब्रांड, आभूषण घराने, फर्नीचर कंपनियां और बड़े बैंकों ने पैलेस ग्राउंड्स में स्टॉल लगाए थे। वाणिज्यिक कियोस्क, वीआईपी गैलरी, भुगतान पार्किंग, राजनीतिक बैनर और प्रवेश पास पर लग्जरी सामानों के लिए लकी ड्रा कूपन ने भी यह स्पष्ट किया कि यह आयोजन परंपरा के बजाय लाभ और तमाशे के लिए तैयार किया गया था।
कर्नाटक राज्य ने पहले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष PCA अधिनियम 1960 में संशोधन का बचाव इस स्पष्ट आधार पर किया था कि कंबाला परंपरागत रूप से केवल उडुपी और दक्षिण कन्नड़ में ही प्रचलित है। बाद में उच्च न्यायालय के समक्ष यह दावा कि कंबाला पूरे राज्य की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता है, उसकी अपनी पूर्व प्रस्तुतियों का विरोधाभास करता है और उस आधार को कमजोर करता है जिस पर सांस्कृतिक अपवाद को बरकरार रखा गया था। PETA इंडिया माननीय सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह करता है कि वह एक क्रूर स्थानीय प्रथा को व्यावसायिक लाभ के लिए पूरे राज्य में सांस्कृतिक अनुमति के रूप में फैलाने से रोके।

