PETA इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कुत्तों के लिए अंतिम संस्कार वाली चिता के आकार के पिंजरों और गायों को “नज़र से दूर, भूल जाने जैसी” नीति के तहत रखने के खिलाफ विरोध जताया, और समुदायिक पशुओं की आबादी को मानवीय तरीके से संभालने के लिए रोडमैप प्रस्तुत किए।
PETA इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में Suo Motu Petition (C) No.5 of 2025: IN RE: ‘CITY HOUNDED BY STRAYS, KIDS PAY PRICE’ के तहत याचिका दायर की है। इसमें PETA इंडिया ने कोर्ट से अनुरोध किया है कि विभिन्न इलाकों के कुत्तों को जेल में बंद करने और गायों को “नज़र से दूर, दिमाग से दूर” की नीति पर पकड़ने के आदेश पर पुनर्विचार किया जाए, और इसके बजाय समुदायिक पशुओं का मानवीय, कानूनी और वैज्ञानिक आधार पर प्रबंधन करने के लिए निर्देश जारी किए जाएँ, जैसा कि PETA इंडिया द्वारा प्रस्तुत रोडमैप में सुझाया गया है।
अपनी याचिका में, PETA इंडिया ने कोर्ट को चेतावनी दी है कि कुत्तों और गायों को जीवनभर के लिए तंग और धन की कमी वाले केंद्रों में रखना न केवल क्रूर और अमानवीय है, बल्कि बड़े पैमाने पर इसे लागू करना असंभव है, यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरा है और वास्तविक समाधानों जैसे कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2023 के कार्यान्वयन से संसाधनों को भटका देगा, और अंततः इंसानों और पशुओं के बीच होने वाले संघर्ष की घटनाओं को और बढ़ा देगा। PETA ने कोर्ट से यह भी आग्रह किया है कि भारतीय जीव जन्तु कल्याण (AWBI) के SOP के कार्यान्वयन पर रोक लगाई जाए, जो बड़े पैमाने पर आश्रयों की सिफारिश करता है और प्रत्येक कुत्ते के लिए केवल 20 वर्ग फीट की ही जगह प्रदान करता है यह लगभग पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार करने वाली एक चिता के बराबर की जगह है।
वीडियो जिसमे यह दिखता है कि इस निर्णय का पशुओं पर क्या प्रभाव होगा यहाँ देखा जा सकता है।
अन्य सुझावों के बीच, PETA इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, 2023 के कार्यान्वयन को एक बार फिर से पुष्टि करे और उसे मजबूत करे, बजाय इसके कि कोर्ट केवल दंडात्मक और जल्दबाज़ी में किए जाने वाले विस्थापन उपायों पर ध्यान दे, जो अब तक जहाँ भी लागू किए गए हैं, असफल साबित हुए हैं। PETA इंडिया ने कोर्ट के विचारार्थ दो व्यापक, विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए रोडमैप भी प्रस्तुत किए हैं, जिन्हें भारत के प्रधानमंत्री, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तथा भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड (AWBI) को भी भेजा गया है।
- भारत में समुदाय के कुत्तों के मानवीय प्रबंधन के लिए रोडमैप
- भारत में बेघर मवेशियों के मानवीय प्रबंधन के लिए रोडमैप
अहिंसा और वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांतों पर आधारित ये रोडमैप रोकथाम, साक्ष्य-आधारित और कानूनी रूप से ठोस समाधान प्रदान करते हैं। ये मूल कारणों को हल करते हैं, जैसे पशुओं की बिक्री करने वाली अवैध दुकानों और प्रजनकों की गतिविधियाँ, आवेगी रूप से कुत्ते खरीदकर उन्हें छोड़ देना, और दूध उत्पादन कम हो जाने पर डेयरी उद्योग द्वारा गायों का त्याग करना एवं नर बछड़ों को छोड़ देना।
प्रस्तावित रोडमैप में सुझाए गए उपाय :
सामुदायिक कुत्तों के लिए: एबीसी नियम, 2023 का प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन; छोटे पैमाने पर नसबंदी और रेबीज़ टीकाकरण क्षमता का विस्तार; अवैध ब्रीडर्स और पालतू पशुओं की बिक्री करने वाली दुकानों पर रोक; कुत्तों की अवैध लड़ाइयों में इस्तेमाल होने वाली विदेशी कुत्तों की प्रजातियों के प्रजनन पर प्रतिबंध; पशुओं को भोजन कराने वालों (community feeders) की सुरक्षा; तथा बेघर पशुओं को गोद लेने के लिए मजबूत सरकारी प्रोत्साहन जैसे उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
मवेशियों के लिए प्रस्तावित रोडमैप में उनके परित्याग के खिलाफ सख्त दंड; अवैध डेयरियों को बंद करना; डेयरियों तक मवेशियों की ट्रेसबिलिटी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उपाय; पशुओं का प्रजनन रोकने के लिए गौशालाओं का नियमन; डेयरी पशुओं पर निर्भरता कम करने हेतु पौधों से बने दूध के उत्पादन को बढ़ावा देने वाली खाद्य नीतियाँ, जैसे उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।
PETA इंडिया ने कोर्ट के सामने यह ज़ोर देकर कहा है कि भारत में स्वतंत्र रूप से बेघर जीवन यापन करने वाले अनगिनत कुत्तों और लगातार बढ़ती मवेशियों की आबादी को बंद करना न तो संभव है और न ही मानवीय। भारत में अनुमानित 62 मिलियन सामुदायिक कुत्ते और 5 मिलियन बेघर मवेशी हैं (जो डेयरी उद्योग में त्याग के कारण लगातार बढ़ रहे हैं), और आबादी के एक छोटे से हिस्से को भी बंद रखने के लिए न तो पर्याप्त बुनियादी ढांचा है, न वित्तीय संसाधन और न ही प्रशासनिक क्षमता, जिससे व्यापक पीड़ा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम का खतरा अवश्य बढ़ेगा।
PETA इंडिया ने अपनी याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस मामले में जारी किए जाने वाले किसी भी निर्देश में संवैधानिक मूल्यों, मौजूदा पशु-संरक्षण कानूनों और भारत की लंबे समय से चली आ रही करुणामय सह-अस्तित्व की प्रतिबद्धता का पालन सुनिश्चित किया जाए।