स्वतंत्रता दिवस से पहले आगरा में ‘घायल पक्षी’ की अपील – पतंगबाज़ी से पहले पक्षियों के बारे में सोचें
15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) से ठीक पहले, PETA इंडिया की एक समर्थक ने स्वयं को ‘लहूलुहान पक्षी’ की वेशभूषा में, तेज़ मांझे से घायल होने की स्थिति दर्शाते हुए एक विशाल पतंग पर लेट कर प्रदर्शन किया, जिस पर लिखा था: “काँच का लेप चढ़ी तेज़ डोर (मांझा), पक्षियों के पंखों को काट देती है कृपया मांझे का इस्तेमाल न करें।” इस अभियान का उद्देश्य लोगों को यह जागरूक करना है कि काँच और धातु पाउडर से लेपित सूती डोर (मांझा) और नायलॉन मांझा हर साल हजारों पक्षियों और इंसानों की चोट और मौत का कारण बनते हैं। इस प्रदर्शन के माध्यम से आम लोगों से अपील की गई कि वे पतंगबाज़ी के दौरान इन खतरनाक मांझों का उपयोग न करें, ताकि पतंगबाज़ी सभी के लिए सुरक्षित और आनंददायक बन सके।
मांझा इंसानों और पक्षियों दोनों के लिए हानिकारक है और उन्हें चोटिल करने व उनकी मौत का कारण भी बनता है। पतंगबाज़ी में केवल साधारण सूती डोर का उपयोग करके हर कोई इन गंभीर चोटों और दुखद मौतों को रोकने में मदद कर सकता है। PETA इंडिया सभी से अपील करता है कि मांझे का उपयोग न करें, ताकि स्वतंत्रता दिवस सभी के लिए खुशियों भरा और सुरक्षित बना रहे।
हर तरह का मांझा इंसानों, अन्य पशुओं और पर्यावरण के लिए खतरनाक होता है। काँच और धातु पाउडर का लेप चढ़ा मांझा पक्षियों की आबादी पर विनाशकारी प्रभाव डालता है, जिनमें गिद्ध जैसी संकटग्रस्त प्रजातियाँ भी शामिल हैं। मांझा अक्सर पक्षियों के पंखों और पैरों को काट देता है या पूरी तरह से अलग कर देता है, और गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद कई पक्षी छिप जाते हैं, जिससे बचावकर्मी उनकी मदद नहीं कर पाते और वे खून बहने से मर जाते हैं।
मांझा के कारण बेवजह इंसानों की मौतें भी होती हैं। केवल 2025 में ही देशभर में कई मौतें दर्ज की गईं, जिनमें दिल्ली में एक 22 वर्षीय युवक, गुजरात में एक 5 साल का बच्चा, और उत्तर प्रदेश में ड्यूटी पर तैनात 30 वर्षीय पुलिस कांस्टेबल की मौत शामिल है। ऐसी और भी कई चोटें और जानलेवा घटनाएं हुई हैं — और अफ़सोस की बात यह है कि ये सब रोकी जा सकती थीं।
इंसानों और अन्य पशुओं के लिए गंभीर जोखिमों के अलावा, मांझा पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा है। नायलॉन, काँच और धातु-लेपित मांझे का उपयोग प्रदूषण की बढ़ती समस्या को और गंभीर बनाता है, क्योंकि ये डोरियाँ वर्षों तक खराब नहीं होतीं और पर्यावरण में पड़ी रहती हैं। इसके अलावा, मांझा बिजली की तारों में फंसकर उन्हें आपस में चिपका देता है, जिससे बिजली की आपूर्ति प्रभावित होती है। केवल एक लाइन में रुकावट आने से हजारों लोग बिजली के संकट का सामना करते हैं।
मांझे के उपयोग को रोकने में मदद करें!

