रामपुर पुलिस और वन अधिकारियों द्वारा वन्यजीव व्यापारी के ठिकाने पर छापेमारी के बाद 120 से अधिक तोतों और कबूतरों को मिली आज़ादी, PETA इंडिया की शिकायत के बाद हुई कार्रवाई

Posted on by Surjeet Singh

PETA इंडिया की शिकायतों के बाद हुई कार्रवाई में उत्तर प्रदेश वन विभाग के रामपुर वन प्रभाग और रामपुर पुलिस ने स्वार थाने ने नरपत नगर गांव में एक कथित अवैध वन्यजीव व्यापारी के घर पर छापा मारा और 120 से अधिक तोतों एवं कबूतरों को आज़ाद करवाया।

12 अगस्त को की गई यह छापेमारी PETA इंडिया की उस जांच के बाद हुई, जिसमें एक आरोपी द्वारा सोशल मीडिया पर कथित रूप से पोस्ट की गई सामग्री सामने आई थी। इसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 (2022 में संशोधित) की अनुसूची 1 और 2 के तहत संरक्षित जंगली पशुओं को अवैध रूप से पकड़ने और उनके साथ क्रूरता करने के वीडियो और तस्वीरें दिखाई गई थीं। कुछ अन्य वीडियो से यह भी पता चला कि आरोपी अवैध कबूतरबाज़ी के लिए कबूतरों को पकड़ने, प्रशिक्षित करने और उनका इस्तेमाल करता था। जांच के दौरान मिली जानकारी के आधार पर PETA इंडिया ने आरोपी का पता नरपत नगर गांव में लगाया और अधिकारियों को इसकी सूचना दी। छापेमारी के दौरान अधिकारियों को 80 से अधिक भारतीय तोते और 40 कबूतर छोटे, गंदे और अस्वच्छ पिंजरों में कैद मिले। वहां पक्षियों की अवैध खरीद-बिक्री किए जाने के सबूत भी मिले।

कबूतरों की चिकित्सकीय जांच की गई और PETA इंडिया ने वन एवं पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में उन्हें पीपली वन क्षेत्र में आज़ाद कर दिया। अलेक्ज़ेंड्राइन, रोज़-रिंग्ड और प्लम-हेडेड तोतों को चिकित्सकीय जांच के बाद और रामपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेश के अनुसार वन विभाग के अधिकारियों ने पीपली वन क्षेत्र में आज़ाद किया।

स्वार थाने ने आरोपी अरबाज़ खान और कुछ अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धाराओं 9, 39 और 51; भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धाराओं 3(5) और 325; तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धाराओं 11(1)(a), 11(1)(c), 11(1)(e), 11(1)(m)(ii), 11(1)(n), 11(1)(l) और 38(3) के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की है। इसके अलावा, रामपुर वन प्रभाग ने तीन आरोपियों–अरबाज़, सद्दाम और दुल्ला–के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धाराओं 9, 39, 48A, 49B, 50 और 51(1) के तहत प्रारंभिक अपराध रिपोर्ट (पीओआर) दर्ज की है। अलेक्ज़ेंड्राइन, रोज़-रिंग्ड और प्लम-हेडेड तोते वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची 2 के तहत संरक्षित हैं। इन्हें अवैध रूप से पकड़ना, अपने पास रखना, खरीदना या बेचना अपराध है, जिसके लिए 1 लाख रुपये तक का जुर्माना, तीन साल तक की जेल या दोनों की सजा हो सकती है। अधिकारी आरोपियों का पता लगाकर उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश कर रहे हैं।

अवैध पक्षी व्यापार में अनगिनत पक्षियों को उनके परिवारों से अलग कर दिया जाता है और उनसे जुड़ी हर प्राकृतिक और जरूरी चीज छीन ली जाती है, ताकि उन्हें “पालतू पशु” के रूप में बेचा जा सके या झूठी भविष्यवाणी करने वालों के लिए इस्तेमाल किया जा सके। अक्सर छोटे पक्षियों को उनके घोंसलों से जबरन उठा लिया जाता है। दूसरे पक्षी जाल या फंदों में फंसकर घबरा जाते हैं, जिससे आज़ाद होने की कोशिश में उन्हें गंभीर चोट लग सकती है या उनकी मौत भी हो सकती है। पकड़े गए पक्षियों को छोटे-छोटे डिब्बों में भरकर ले जाया जाता है। अनुमान है कि इनमें से करीब 60% पक्षी टूटे पंखों और पैरों, पानी की कमी या अत्यधिक डर और घबराहट के कारण रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। जो पक्षी बच जाते हैं, उन्हें भी कैद में बेहद कठिन जीवन जीना पड़ता है और वे कुपोषण, अकेलेपन, अवसाद और तनाव से पीड़ित होते हैं।

कबूतरबाज़ी में इस्तेमाल किए जाने वाले कबूतरों को अक्सर छोटे, गंदे पिंजरों और दड़बों में बंद रखा जाता है, जिससे उन्हें तनाव होता है और बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ जाता है। एक जगह से दूसरी जगह ले जाते समय पक्षियों को अक्सर तार के पिंजरों या गत्ते के डिब्बों में बहुत अधिक संख्या में भर दिया जाता है। इससे उनकी आवाजाही रुक जाती है, उन्हें चोट लग सकती है और उनका दम भी घुट सकता है। ऐसी प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होने वाले कबूतरों को कथित तौर पर अक्सर अफीम भी दी जाती है। कबूतरबाज़ी और कबूतरों की दौड़ के अलग-अलग प्रकार के आयोजन होते हैं। इनमें कबूतर को तब तक उड़ने के लिए मजबूर करना भी शामिल हो सकता है, जब तक वह पूरी तरह थक न जाए। पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से के पंजाब प्रांत के फैसलाबाद में एक व्यक्ति ने कथित तौर पर कबूतरबाज़ी प्रतियोगिता हारने के बाद पिंजरे में बंद अपने सभी कबूतरों को जला दिया था। ‘सार्वजनिक जुआ अधिनियम 1867’ के तहत जुआ एक अपराध है और कबूतरबाज़ी के आयोजनों में यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, देशी पक्षियों को पकड़ने, पिंजरों में बंद करने और उनका व्यापार करने पर रोक लगाता है। इसका पालन न करने पर जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। इसके अलावा, पक्षियों को पिंजरों में बंद करना पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का उल्लंघन है। इस कानून के अनुसार किसी भी पशु को ऐसे पिंजरे या अन्य जगह में रखना या बंद करना गैरकानूनी है, जहां उसे उचित रूप से घूमने-फिरने की सुविधा न मिले। उड़ने वाले पक्षी के लिए इसमें उड़ने की पर्याप्त जगह भी शामिल है।

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