PETA इंडिया की शिकायत के बाद बलिया वन प्रभाग द्वारा पालतू पशुओं की बिक्री करने वाली दुकान से चार तोते जब्त किए।
एक जागरूक नागरिक से यह जानकारी मिलने के बाद कि रामलीला मैदान के पास स्थित विश्वजीत दर्शन एक्वेरियम में चार एलेक्ज़ेंड्राइन तोतों की खुलेआम बिक्री की जा रही है और उन्हें दयनीय परिस्थितियों में एक तंग पिंजरे में कैद किया गया है, पीपुल फॉर द एथीकाल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA इंडिया) ने बलिया वन प्रभाग के साथ मिलकर इन पक्षियों को बचाया। मौके पर पहुंचने पर वन अधिकारियों को चार तोते मिले, जिन्हें तुरंत जब्त कर लिया गया।
बलिया वन प्रभाग ने विश्वजीत दर्शन एक्वेरियम के मालिक, कथित आरोपी, के खिलाफ वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (WPA), 1972 की धारा 9, 39 और 51 के तहत एक प्रारंभिक अपराध रिपोर्ट (POR) दर्ज की है। एलेक्ज़ेंड्राइन तोते WPA की अनुसूची II के तहत संरक्षित हैं। इस प्रजाति को खरीदना, बेचना या अपने पास रखना एक दंडनीय अपराध है, जिसके लिए अधिकतम 1 लाख रुपये का जुर्माना या अधिकतम तीन वर्ष की जेल या दोनों हो सकते हैं।
बचाव के बाद, तोतों को स्वास्थ्य जांच और पशु-चिकित्सा मूल्यांकन के लिए भेजा गया। पशु-चिकित्सक से अनुमति मिलने के बाद पक्षियों को प्रकृति में छोड़ दिया गया। इस प्रजाति का रखना, बेचना या व्यापार करना तीन वर्ष तक की कैद या 1 लाख रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडनीय है।
PETA इंडिया उत्तर प्रदेश वन विभाग के बलिया वन प्रभाग, विशेष रूप से प्रभागीय वन अधिकारी श्री अपूर्व दीक्षित, IFS, के प्रति आभारी है, जिन्होंने तुरंत तोतों को कैद से बचाया। PETA इंडिया सभी से अपील करता है कि यदि उन्हें किसी पशु के साथ क्रूरता की जानकारी मिले तो वह स्थानीय पशु संरक्षण समूह और पुलिस को या वन्यजीव से संबंधित मामलों में वन विभाग को रिपोर्ट करे।
अवैध पक्षी व्यापार में, असंख्य पक्षियों को उनके परिवारों से छीन लिया जाता है और उन्हें उनसब चीजों से वंचित कर दिया जाता है जो उनके लिए प्राकृतिक रूप से आवश्यक होती है ताकि उन्हें पालतू पशु के रूप में बेचा जा सके या उन्हें नकली भविष्य बताने वालों (फॉर्च्यून-टेलर्स) के रूप में इस्तेमाल किया जा सके। नन्हें पक्षियों को अक्सर घोंसलों से चुरा लिया जाता है, और अन्य पक्षी जाल में फंसने पर घबरा जाते हैं, जिससे वे खुद को छुड़ाने की कोशिश में गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं या मर सकते हैं। पकड़े गए पक्षियों को छोटे पिंजरों व बक्सों में ठूंस दिया जाता है, और अनुमान है कि उनमें से लगभग 60% परिवहन के दौरान पंखों और पैरों के टूटने, प्यास या भय से मर जाते हैं। जो जीवित रहते हैं, उन्हें जिंदगी भर दुखभरी कैद का सामना करना पड़ता है, जिसमें कुपोषण, अकेलापन, अवसाद और तनाव शामिल हैं।
