मछलियों के दर्द का अहसास कराने के लिए मुंबई में PETA की वैश्विक संस्थापक को बर्फ की सिल्ली पर ‘काटा गया’
बांद्रा वेस्ट के कार्टर रोड प्रोमेनेड पर अरब सागर के किनारे जॉगिंग करने वाले, साइकिल चलाने वाले और वहां से गुजरने वाले लोगों को एक चौंकाने वाला दृश्य देखने को मिला। PETA की वैश्विक संस्थापक इंग्रिड न्यूकिर्क मछली के वेश में खून से सनी “बर्फ” की सिल्ली पर लेटी तड़प रही थी, जहां एक “मछुआरा” उन्हें “काटता” हुआ नजर आया। “मछलियाँ भी दर्द महसूस करती हैं, उन्हें भोजन न बनाएं” लिखे संदेशों से घिरा यह प्रतीकात्मक प्रदर्शन ऐसे समय में किया गया जब भारत और दुनिया भर में मछलियों का उपभोग चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। भारत में अब लगभग 72% लोग मछली खाते हैं, जबकि दुनियाभर में हर साल लगभग 2.7 ट्रिलियन मछलियां भोजन के लिए दर्दनाक मौत का सामना करती हैं।
भारत में पली-बढ़ीं और यहां पशुओं के प्रति सम्मान की परंपरा से प्रेरित होकर PETA की स्थापना करने वाली न्यूकिर्क का उद्देश्य लोगों को यह सोचने के लिए प्रेरित करना है कि मछलियां भी दर्द और डर महसूस करती हैं और वे भी कष्ट सहना या मरना नहीं चाहतीं। Scientific Reports में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, दम घुटने से मरने से पहले मछलियां 20 मिनट से भी अधिक समय तक अत्यंत पीड़ा सहती हैं।
“ज़रा कल्पना कीजिए कि आप होश में हों और आपको दम घोंटकर मारा जाए, कुचला जाए या टुकड़ों में काट दिया जाए और आप यह सब महसूस कर रहे हों। हर साल खरबों मछलियां ऐसी भयानक पीड़ा झेलती हैं। PETA इंडिया सभी से अपील करता है कि समुद्री जीवों को संवेदनशील प्राणी के रूप में समझें और कृपया वीगन बनें।” – इंग्रिड न्यूकिर्क
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है और जलीय कृषि (aquaculture production) में भी दूसरे स्थान पर है। अनुमान है कि भारत में हर साल लगभग 14 अरब मछलियों को फार्मों में पाला जाता है। इन मछलियों को बेहद भीड़भाड़ और गंदे माहौल में रखा जाता है, जहां परजीवी, बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण और बीमारियां आम होती हैं। दूसरी ओर, व्यावसायिक मछली पकड़ने के दौरान इतने बड़े जाल डाले जाते हैं कि हर साल बड़ी संख्या में ऐसे समुद्री जीव भी मारे जाते हैं जिन्हें निशाना नहीं बनाया गया होता। इनमें लगभग 7,20,000 समुद्री पक्षी, 3,00,000 व्हेल और डॉल्फ़िन, 3,45,000 सील और सी लॉयन, तथा 10 करोड़ शार्क और रे शामिल हैं।
वैज्ञानिकों ने पुष्टि की है कि मछलियाँ भी स्तनधारियों की तरह दर्द को तीव्रता से महसूस करती हैं। उनकी याददाश्त लंबे समय तक रहती है, वे खुद को आईने में पहचान सकती हैं और चीं-चीं, कराह जैसी कम आवृत्ति वाली आवाज़ों के माध्यम से एक-दूसरे से संवाद भी करती हैं, जिन्हें इंसान केवल विशेष उपकरणों की मदद से ही सुन सकते हैं। हर साल भोजन के लिए जितनी मछलियाँ मारी जाती हैं, उनकी संख्या अन्य सभी पशुओं को मिलाकर मारे जाने वाली संख्या से भी अधिक है। अक्सर उन्हें बेहद दर्दनाक तरीकों से मारा जाता है उन्हें कांटे से भेदा जाता है, कुचला जाता है, पेट चीर दिया जाता है या जीवित और होश में रहते हुए उबलते पानी में डाल दिया जाता है।
जो भी व्यक्ति वीगन जीवनशैली अपनाता है, वह हर साल लगभग 200 पशुओं की जान बचा सकता है, अपने भोजन से होने वाले कार्बन फुटप्रिंट को लगभग 73% तक कम कर सकता है और हृदय रोग, मधुमेह तथा कैंसर जैसी बीमारियों के खतरे को भी घटा सकता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जलवायु संकट के सबसे गंभीर प्रभावों से निपटने के लिए दुनिया भर में लोगों का वीगन भोजन को अपनाने की ओर बढ़ना आवश्यक है।


