स्थानीय पशु कार्यकर्ता, SPCA और PETA इंडिया के हस्तक्षेप के बाद गाजियाबाद में कुत्ते को पीटकर ज़िंदा दफनाने के मामले में एफआईआर दर्ज

Posted on by Surjeet Singh

एक कुत्ते को डंडों और क्रिकेट बैट से बेरहमी से पीटने और फिर उसे ज़िंदा दफना देने की घटना की जानकारी मिलने के बाद, PETA इंडिया ने मोदीनगर पुलिस थाना, स्वयंसेवक विभोर कटारिया और गाजियाबाद सोसाइटी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी टू एनिमल्स (एसपीसीए) के सदस्य संदीप गुप्ता के साथ मिलकर यह सुनिश्चित किया कि इस मामले में कानून की संबंधित सख्त धाराओं के तहत प्राथमिकी सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की जाए।

यह घटना 18 जुलाई 2026 की है और इसमें कथित रूप से दो भाइयों, अमन और मुकुल, ने एक सामुदायिक कुत्ते को बुरी तरह पीटा। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी कुत्ते को घसीटकर पास के एक मैदान में ले जाया गया और उसे ज़िंदा ही दफना दिया गया। वीडियो में दोनों भाइयों के हाथ में एक डंडा और फावड़ा दिखाई देता है, जिनका इस्तेमाल ज़मीन खोदकर कुत्ते को ज़िंदा दफनाने के लिए किया गया।

हाल ही में इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 325 और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (पीसीए), 1960 की धारा 11 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। बीएनएस, 2023 की धारा 325 के अनुसार किसी भी पशु को मारना, ज़हर देना, गंभीर रूप से घायल करना या उसे बेकार बना देना संज्ञेय अपराध है। इसके लिए पाँच वर्ष तक की कैद, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। हम गाजियाबाद के मोदीनगर के सहायक पुलिस आयुक्त श्री भास्कर वर्मा और मोदीनगर थाना प्रभारी निरीक्षक श्री आनंद मिश्रा की सराहना करते हैं, जिन्होंने एफआईआर दर्ज कराने का निर्देश देकर यह स्पष्ट संदेश दिया कि पशुओं के साथ क्रूरता बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियम, 2023 के नियम 11(19) के अनुसार सामुदायिक कुत्तों को केवल नसबंदी के उद्देश्य से ही पकड़ा जा सकता है और उन्हें किसी दूसरी जगह ले जाना गैरकानूनी है। नियम में स्पष्ट कहा गया है कि “नसबंदी के बाद कुत्तों को उसी स्थान या इलाके में छोड़ा जाएगा, जहां से उन्हें पकड़ा गया था।” 11 मई 2026 के अपने फैसले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी एबीसी नियमों को बरकरार रखते हुए दोहराया कि एबीसी नियम, 2023 में निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद कुत्तों को उनके मूल क्षेत्र में ही वापस छोड़ा जाना चाहिए।

PETA इंडिया की सिफारिश है कि पशुओं के साथ क्रूरता करने वाले लोगों की मनोवैज्ञानिक जांच कराई जाए और उन्हें परामर्श दिया जाए, क्योंकि पशुओं के साथ हिंसा करना गंभीर मानसिक समस्या का संकेत हो सकता है। शोध बताते हैं कि पशुओं के साथ क्रूरता करने वाले लोग अक्सर दोबारा ऐसे अपराध करते हैं और आगे चलकर अन्य पशुओं तथा इंसानों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। फॉरेंसिक रिसर्च एंड क्रिमिनोलॉजी इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, “पशुओं के साथ क्रूरता करने वाले लोगों द्वारा हत्या, बलात्कार, डकैती, हमला, उत्पीड़न, धमकी और नशीले पदार्थों के दुरुपयोग जैसे अन्य अपराध करने की संभावना तीन गुना अधिक होती है।”

सामुदायिक कुत्ते अक्सर क्रूरता का शिकार होते हैं, वाहनों की चपेट में आ जाते हैं और भूख, बीमारी या चोट से भी पीड़ित रहते हैं। हर साल बड़ी संख्या में ऐसे कुत्ते पशु आश्रय-स्थलों में पहुंच जाते हैं, जहां अच्छे घरों की कमी के कारण वे लंबे समय तक पिंजरों या केनेल में रहने को मजबूर होते हैं। इसका सरल समाधान है नसबंदी और सड़कों या पशु आश्रय-स्थलों से गोद लेना। एक मादा कुत्ते की नसबंदी छह वर्षों में लगभग 67,000 जन्मों को रोक सकती है, जबकि एक मादा बिल्ली की नसबंदी सात वर्षों में लगभग 4,20,000 जन्मों को रोक सकती है।

पशुओं के साथ क्रूरता करने वाले लोग अक्सर आगे चलकर दूसरे जानवरों और इंसानों को भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। सभी की सुरक्षा के लिए यह बेहद जरूरी है कि आम लोग इस तरह की पशु क्रूरता की घटनाओं की सूचना पुलिस को दें।

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