60 से अधिक प्राइमेटोलॉजिस्ट ने PETA इंडिया के साथ मिलकर भारतीय प्रजाति के बंदरों (रीसस मकाक) के लिए मजबूत सुरक्षा प्रावधानों की मांग करी
आज भेजे गए एक पत्र में, 60 से अधिक प्रमुख प्राइमेटोलॉजिस्ट (वह वैज्ञानिक जो बंदरों एवं इसी तरह की अन्य प्रजातियों का अध्ययन करते हैं) और वन्यजीव विशेषज्ञों ने PETA इंडिया के साथ मिलकर ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ (MOEFCC) से भारतीय प्रजाति के बंदरों (रीसस मकाक) को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (WPA), 1972 के तहत एक संरक्षित प्रजाति के रूप में फिर से सूचीबद्ध करने और उन्हें अनुसूची-I के तहत सर्वोच्च सुरक्षा प्रदान करने की अपील की।
पत्र में यह बताया गया है कि 2022 में पिछले 50 वर्षों से रीसस मकाकों को दी जा रही सुरक्षा को हटा लिया गया है जिससे वे पालतू पशुओं के व्यापार, बंदरों के खेल और अन्य अमानवीय गतिविधियों के लिए पकड़े जाने के जोखिम में या गए हैं जो उनके अस्तित्व के लिए खतरा है। इस पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन बंदरों का उनके प्राकृतिक आवास से जबरन पकड़ लिया जाना न केवल इको सिस्टम को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि इंसान और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को भी बढ़ाता है और भारत सहित पूरे विश्व में ज़ूनोटिक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ाता है।
रीसस मकाक सामाजिक और बुद्धिमान बंदर होते हैं, जो जन्म से एक साल तक अपनी माँ का दूध पीते हैं। हिंदू धर्म में इन्हें विशेष सम्मान दिया जाता है, और ये फल कहना बभूत पसंद करते हैं जइस कारण ये फलों के सेवन के दौरान फल के बीजों को इधर उधर फैलाकर हमारे इको सिस्टम को बनाए रखने में बहुत मदद करते हैं। इनकी अनुपस्थिति से इको सिस्टम को बड़ा नुकसान पहुँच सकता है।
पालतू पशुओं के व्यापार या बंदरों का खेलकूद दिखने वाली मदारियों के द्वारा पकड़े जाने से इन पर क्रूरता होती है, इन्हें यातनाएं देकर मजबूरन आज्ञा मानने के लिए विवश किया जाता है। नोच प्लास से इनके दांत निकाल दिए जाते हैं जिससे न सिर्फ इन्हें गंभीर शारीरिक पीड़ा होती है बल्कि ये गंभीर संक्रमणों और लंबी अवधि तक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना भी करते हैं। इसके बाद, यदि इन्हें लावारिस छोड़ दिया जाता है, तो ये पूरी तरह असहाय हो जाते हैं। समाज से अलग और अपने स्वाभाविक व्यवहार से दूर, ये बंदर अप्राकृतिक तरीके से व्यवहार करने लगते हैं, जिससे इंसानों और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा, जबरन बंदी बनाए जाने के कारण पैदा तनाव इनकी प्रतिरक्षक शक्ति को कमजोर कर देता है, जिससे इनके जरिये इंसानों में ट्यूबरक्लोसिस, हर्पीज़ बी और सिमियन फोमी वायरस जैसी खतरनाक ज़ूनोटिक बीमारियों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है।
