डीग पुलिस ने PETA इंडिया की शिकायतों के बाद मुर्गों की अवैध लड़ाई कार्यक्रम हेतु दो FIR दर्ज कीं और लड़ाईन्यों में इस्तेमाल होने वाले आठ मुर्गों को बचाया

Posted on by Surjeet Singh

डीग पुलिस ने हाल ही PETA इंडिया की शिकायतों पर कार्यवाही करते हुए पशुओं की अवैध लड़ाई के दो आयोजनों के खिलाफ कार्यवाही करते हुए FIR दर्ज कीं और इन लड़ाईन्यों में इस्तेमाल होने वाले आठ शोषित मुर्गों को बचाया।

डीग जिले के पहारी इलाके में मुर्गों की लड़ाई कार्यक्रम की सूचना मिलने पर, PETA इंडिया ने अधिकारियों को सचेत किया। उसके बाद, पहारी पुलिस अधिकारियों ने मुर्गों की लड़ाई के जारी कार्यक्रम के बीच हस्तक्षेप कर इस लड़ाइयों को रुकवा दिया। PETA इंडिया की शिकायत के आधार पर, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 325; पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 11(1)(m) और 11(2); व राजस्थान सार्वजनिक जुआ अध्यादेश, 1949 की धारा 13 के तहत सात व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज की गई।

इसी तरह अगस्त में, PETA इंडिया की शिकायत पर, कैथवारा पुलिस ने छल्ला बास, कैथवारा में मुर्गों की लड़ाई के एक आयोजन में शामिल सात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की, जिसके बारे में Facebook पर एक Live वीडियो से पता चल था। दो सप्ताह तक चली जांच के बाद, पुलिस ने 22 अगस्त को पक्षियों के मालिक का पता लगाया।

Facebook वीडियो में दिखाया गया कि कैथवारा में चल रही मुर्गों की लड़ाई में डरे -सहमे मुर्गों के पैरों में धारदार ब्लेड बंधे थे। एक रेफरी बाँस के लकड़ी से उन्हें उकसा रहा था, और दर्शक खुलेआम उनकी जीत हार पर जुआ खेल रहे थे। खून से लथपथ होने के बावजूद ये पक्षी बार-बार लड़ने के लिए मजबूर किए जा रहे थे।

डीग पुलिस ने जब्त किए गए मुर्गों का पुनर्वास PETA इंडिया को सौंपा है। अब ये पशु एक प्रतिष्ठित अभयारण्य में सुरक्षित रूप से रहेंगे, जहाँ उन्हें देखभाल और सुरक्षा मिलेगी।

मुर्गों की लड़ाई स्वाभाविक रूप से क्रूर है व यह खतरनाक होती है और समाज में जुआ व हिंसा को बढ़ावा देती है। हम डीग पुलिस का, विशेषकर श्री ओम प्रकाश मीणा IPS (पुलिस अधीक्षक, डीग), श्री कैलाश चंद गुर्जर (थाना प्रभारी, कैथवारा) और श्री योगेंद्र सिंह (थाना प्रभारी, पहारी) का आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पशुओं पर हो रही क्रूरता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

जबरदस्ती लड़वाने वाले मुर्गों को कई गंभीर चोटों का सामना करना पड़ता है जैसे शरीर चोटिल होना, फेफड़े फट जाना, हड्डियाँ टूट जाना, आँखें खो देना और  लहूलुहान हो जाना। उनके पैरों में तेज़ धारदार ब्लेड बंधे होते हैं, जो कभी-कभी मुर्गों, लड़ाइयों में शामिल लोगों और दर्शकों को भी घायल कर सकते हैं। इस तरह के अवैध आयोजनों में भारी मात्रा में जुआ और शराब का सेवन किया जाता है, जिससे यह कई स्तरों पर सामाजिक समस्या बन जाती है। साथ ही, मुर्गों के परिवहन और हैंडलिंग से बर्ड फ्लू जैसी आपदाओं को न्योता देने वाली बीमारियाँ फैलने का जोखिम भी बढ़ जाता है।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 पशुओं को लड़ने के लिए उकसाने पर रोक लगाता है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक निर्णय में, PETA इंडिया और Animal Welfare Board of India की याचिका पर यह फैसला सुनाया गया कि बैलों की लड़ाई, कुत्तों की लड़ाई और मनोरंजन के लिए अन्य पशुओं की लड़ाइयाँ जिसमे इंसान और पशु दोनों शामिल हों, पूरी तरह से समाप्त होनी चाहिए।