अच्छी खबर : PETA इंडिया की शिकायत के बाद सोलापुर, नागपुर और धाराशिव में अवैध बैल और घोड़े की दौड़ तथा भैंसों की लड़ाई कार्यक्रम रोके गए

Posted on by Surjeet Singh

5 अगस्त को नागपुर के कामठी और 2 अगस्त को धाराशिव के कलंब में होने वाले अवैध भैंसों की लड़ाई के आयोजनों की जानकारी मिलने पर, PETA इंडिया ने तुरंत संबंधित पुलिस अधिकारियों को सूचित किया और इन गैरकानूनी आयोजनों को रोकने के कॉर्डिनेट किया। PETA इंडिया की शिकायतों पर कार्रवाई करते हुए, न्यू कामठी पुलिस स्टेशन ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 और 135(3) के तहत रोकथाम कार्रवाई शुरू की, जबकि धाराशिव के परंडा पुलिस स्टेशन ने BNSS, 2023 की धारा 168 के तहत नोटिस जारी किया। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद आयोजकों ने दोनों कार्यक्रम रद्द कर दिए, जिससे कई भैंसों को बेहद क्रूरता से बचाया जा सका।

एक अलग मामले में, 31 जुलाई, 1 अगस्त और 2 अगस्त को होने वाले पशु दौड़ और प्रतियोगिताओं के कार्यक्रमों का प्रचार करने वाले पोस्टर मिलने के बाद, जिनमें बैलगाड़ी दौड़, युवा बैलों की दौड़, घोड़ागाड़ी दौड़ और घोड़े-बैल की दौड़ शामिल थीं, PETA इंडिया ने तुरंत सोलापुर जिले के कानून प्रवर्तन अधिकारियों को सूचित किया। हस्तक्षेप के बाद पुलिस ने आयोजकों को इन गैरकानूनी गतिविधियों का आयोजन न करने की चेतावनी दी और कार्यक्रमों को होने से सफलतापूर्वक रोक दिया। इसके अलावा, मंगलवेढ़ा के उप-विभागीय मजिस्ट्रेट ने 1 अगस्त को प्रस्तावित बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसी दौड़ 24 मई 2023 को जारी महाराष्ट्र सरकार की बैलगाड़ी दौड़ से संबंधित SOP के तहत प्रतिबंधित हैं।

भैंसों की लड़ाई में दो भैंसों को एक-दूसरे के सामने खड़ा करके उनके बीच हिंसक और अक्सर खून से भरी लड़ाई करवाई जाती है। पशुओं को मारा जाता है और लड़ने के लिए उकसाया जाता है, जब तक कि उनमें से एक को विजेता घोषित नहीं कर दिया जाता। इस प्रथा के कारण उन्हें गंभीर शारीरिक और मानसिक नुकसान होता है, जिसमें हड्डियों का टूटना, शरीर में गहरे घाव और अत्यधिक तनाव जैसी चोटें शामिल हैं।

PETA इंडिया द्वारा की गई जाँच से पता चलता है कि बैलगाड़ी दौड़ के दौरान बैलों को तेज दौड़ाने के लिए अक्सर कीलों से जड़ी लकड़ी की छड़ियों से पीटा जाता है, खासकर तेज गर्मी में। उनकी पूँछों को मरोड़ा और तोड़ा जाता है, जिससे उन्हें अत्यधिक दर्द होता है और उनका शरीर खून से लथपथ हो जाता है।

दौड़ में इस्तेमाल किए जाने वाले घोड़ों को तेज गति से दौड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें अक्सर चाबुक और यहाँ तक कि गैरकानूनी बिजली का झटका देने वाले उपकरणों के इस्तेमाल की धमकी दी जाती है। इतनी तेज गति से दौड़ने के कारण उन्हें अक्सर चोटें लगती हैं और उनके फेफड़ों से खून तक आने लगता है। 2016 में, भारतीय पशु कल्याण बोर्ड की एक रिपोर्ट पर विचार करने के बाद राजस्थान हाई कोर्ट ने राजस्थान में तांगा दौड़ पर रोक लगा दी थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि जब घोड़ों को शोर करने वाले वाहनों और तेज आवाज में मौजूद दर्शकों के बीच दौड़ने के लिए मजबूर किया जाता है, तो उन्हें डर और तनाव होता है और उनके साथ क्रूरता होती है। अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं से एक ही गाड़ी खिंचवाना Prevention of Cruelty to Draught and Pack Animals Rules, 1965 का उल्लंघन है, जो PCA Act, 1960 के तहत बनाए गए हैं, क्योंकि अलग-अलग पशु अलग-अलग गति से चलते हैं और उनकी ऊँचाई और शारीरिक क्षमता भी अलग होती है।

Prevention of Cruelty to Animals (PCA) Act, 1960, पशुओं को एक-दूसरे से लड़ने के लिए उकसाने पर रोक लगाता है। ऐतिहासिक फैसले Animal Welfare Board of India v. A. Nagaraja & Ors. (2014) में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं, PETA इंडिया और Animal Welfare Board of India, के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया था कि पशुओं की लड़ाई, जिसमें बैलों की लड़ाई, कुत्तों की लड़ाई और इंसानों के मनोरंजन के लिए पशुओं को शामिल करके आयोजित की जाने वाली अन्य प्रतियोगिताएँ शामिल हैं, गैरकानूनी हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि पशुओं की दौड़ भी पशुओं की लड़ाई के दायरे में आती है, क्योंकि इसमें पशुओं को प्रतिस्पर्धा और ऐसी हानिकारक परिस्थितियों में मजबूर किया जाता है, जिनसे उन्हें दर्द, तनाव और चोट लगने का गंभीर खतरा होता है।

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