PETA इंडिया की शिकायत के बाद बेलगावी में अवैध बैलगाड़ी और घुड़दौड़ प्रतियोगिताएं रद्द

Posted on by Surjeet Singh

28 जुलाई को आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम के प्रचार पोस्टर की जानकारी मिलने पर PETA इंडिया ने तुरंत बेलगावी पुलिस को इसकी सूचना दी। इस कार्यक्रम में बैलगाड़ी दौड़, घोड़ा-बैलगाड़ी दौड़, घोड़ा-गाड़ी दौड़, घोड़ा-कार्ट दौड़, बैठे हुए घोड़े की दौड़ और हाथ में बैल पकड़कर दौड़ जैसी कई प्रतियोगिताएं आयोजित की जानी थीं, जिनमें पशुओं का इस्तेमाल किया जाना था। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आयोजकों को चेतावनी दी और कार्यक्रम आयोजित होने से रोक दिया। इससे अनेक पशुओं को क्रूरता का शिकार होने से बचाया जा सका। PETA इंडिया बेलगावी पुलिस के खडकलाट पुलिस थाने की स्टेशन हाउस ऑफिसर सुश्री कृष्णा वेणी की सराहना करता है, जिन्होंने कानून का पालन सुनिश्चित करते हुए बैलों और घोड़ों को क्रूरता से बचाया। PETA इंडिया के हस्तक्षेप के बाद आयोजकों ने कार्यक्रम रद्द कर दिया और पंजीकृत प्रतिभागियों को इसकी सूचना भी भेज दी।

अपनी शिकायत में PETA इंडिया ने बताया कि इस तरह की दौड़ें पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत प्रतिबंधित हैं और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के कई प्रावधानों का भी उल्लंघन करती हैं। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत किसी पशु को दूसरे पशु से लड़ाने या लड़ने के लिए उकसाना अपराध है। 7 मई 2014 को एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया बनाम ए. नागराजा एवं अन्य (सिविल अपील संख्या 5387/2014) मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि पशुओं की दौड़ जैसी गतिविधियां भी पशुओं की लड़ाई की श्रेणी में आती हैं, क्योंकि इनमें पशुओं को जबरन ऐसी प्रतिस्पर्धी और नुकसानदायक परिस्थितियों में डाला जाता है, जो उन्हें लड़ने के लिए उकसाने के समान हैं।

ऐसे आयोजनों में इस्तेमाल होने वाले पशुओं को अक्सर गंभीर चोटें आती हैं और कई बार उनकी मौत भी हो जाती है। PETA इंडिया की जांच से पता चला है कि बैलगाड़ी दौड़ के दौरान, भीषण गर्मी में बैलों को तेज़ी से दौड़ाने के लिए अक्सर उन्हें कीलें लगी लकड़ी की छड़ियों से पीटा जाता है और उनकी पूंछ मरोड़कर तोड़ दी जाती है, जिससे उन्हें बहुत ज़्यादा दर्द होता है और वे खून से लथपथ हो जाते हैं।

दौड़ में इस्तेमाल किए जाने वाले घोड़ों को बहुत तेज़ गति से दौड़ने के लिए मजबूर किया जाता है। इसके लिए उन्हें अक्सर चाबुक के डर से डराया जाता है और यहां तक कि अवैध रूप से बिजली का झटका देने वाले उपकरणों का भी इस्तेमाल किया जाता है। इतनी तेज़ रफ्तार से दौड़ने के कारण वे अक्सर घायल हो जाते हैं और कई मामलों में उनके फेफड़ों से खून भी बहने लगता है। वर्ष 2016 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने पशु कल्याण बोर्ड ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट पर विचार करने के बाद राज्य में टोंगा दौड़ पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि तेज़ शोर वाले वाहनों और बड़ी भीड़ के बीच घोड़ों को दौड़ाने से उन्हें डर, तनाव और गंभीर पीड़ा होती है।

एक ही गाड़ी को खींचने के लिए अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं का इस्तेमाल करना भी पशु क्रूरता निवारण (बोझा ढोने और गाड़ी खींचने वाले पशु) नियम, 1965 का उल्लंघन है, जो पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत बनाए गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि अलग-अलग प्रजातियों के पशुओं की गति, ऊंचाई और शारीरिक क्षमता अलग-अलग होती है।

पशुओं के साथ होने वाली क्रूरता की हमेशा शिकायत करें