50 से अधिक पशु सुरक्षा संगठनों ने तमिलनाडु और उत्तराखंड सरकारों से हाथी के बच्चे को मंदिर भेजने पर रोक लगाने की अपील की

Posted on by Surjeet Singh

भारत भर के 50 से अधिक पशु सुरक्षा संगठनों ने तमिलनाडु के वन मंत्री और हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती मंत्री तथा उत्तराखंड के वन मंत्री को एक आपातकालीन संयुक्त अपील भेजी है। इसमें उत्तराखंड से एक हाथी के बच्चे को तमिलनाडु के तिरुनेलवेली स्थित अरुलमिगु नेल्लैअपर अरुलथरुम कंथिमथिअम्मन मंदिर में भेजने की योजना को तुरंत रोकने की मांग की गई है। चेन्नई स्थित “पीपल फॉर कैटल इंडिया (PFCI)” ने मंदिर को एक मेकैनिकल हाथी दान देने की पेशकश की है। जांच के दौरान, उत्तराखंड वन विभाग ने मौखिक रूप से बताया है कि यह नर हाथी बच्चा महज दो साल से भी कम उम्र का है। मंदिर में पहले मौजूद हाथी गांधीमति की 11 जनवरी 2025 को लंबी बीमारी के बाद मृत्यु हो गई थी। उसे मधुमेह और गंभीर गठिया जैसी बीमारियां थीं, जो मुख्य रूप से सीमेंट के फर्श पर जंजीरों में बंधे रहने और बिना चलने फिरने वाला जीवन यापन करने के कारण होती हैं।

 

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संगठनों ने चेतावनी दी है कि हाथी के बच्चे को मंदिर के अनुरूप प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया उसे जीवनभर के लिए पीड़ा देगी और यह क़ानूनों का उल्लंघन भी प्रतीत होता है। इसमें वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972, कैप्टिव एलिफेंट (ट्रांसफर या ट्रांसपोर्ट) नियम 2024, और पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 का उल्लंघन शामिल हो सकता है। वे यह भी बताते हैं कि इस प्रस्तावित स्थानांतरण का 2024 के नियमों के तहत कोई कानूनी आधार नहीं है, क्योंकि इन नियमों में किसी जंगली हाथी के बच्चे को निजी या मंदिर की ‘कैद में पाले गए’ हाथी के रूप में वर्गीकृत करने का कोई प्रावधान नहीं है।

संयुक्त पत्र में उत्तराखंड वन विभाग से अनुरोध किया गया है कि वह “वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया” जैसी संस्था से परामर्श लेकर हाथी के बच्चे को दोबारा जंगल में छोड़ने के प्रयास करे, और उसके दीर्घकालिक कल्याण को प्राथमिकता दे। पत्र में लिखा है, “प्राकृतिक वातावरण में, हाथी लगभग 16 वर्षों तक अपनी मां के पास रहते हैं, जो इस बात को स्पष्ट करता है कि उनके लिए परिवार और अपनी प्रजाति के बीच रहना कितना महत्वपूर्ण है। भगवान ने हाथियों को जंगलों में लंबी दूरी तक घूमने, खाने की तलाश करने, तैरने और जंगलों में स्वतंत्र घूमने फिरने के लिए बनाया है ये सभी उनकी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए जरूरी हैं।”

संगठनों ने यह भी कहा, “मंदिरों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाथियों को यातनाएं देकर सबसे पहले उनकी विरोध करने की मांसिक्ता को समाप्त किया जाता है। उन्हें क्राल (लकड़ी का छोटा बाड़ा) में कैद करके रखा जाता है या पेड़ों के बीच जंजीरों से बांधकर इतना पीटा और हथियारों से मारा जाता है कि वे पूरी तरह से टूट जाते हैं और आदेश मानने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मंदिरों में, हाथियों को जीवनभर अकेलेपन, जंजीरों में बंधे रहने और हथियारों के जरिए नियंत्रण में रखा जाता है। विशेष रूप से नर हाथी, मस्त (गर्मी) के समय, अत्यधिक हिंसा का सामना करते हैं। इसके कारण कई हाथी अपने महावतों, भक्तों या अन्य इंसानों पर हमला कर देते हैं।”

नवंबर 2024 में, तिरुचेंदूर में हाथी देवीनई ने अपने महावत और उसके रिश्तेदार की हत्या कर दी थी। इससे पहले, त्रिची में मसीनी और भारत के अन्य हिस्सों में कई हाथी भी महावतों या भक्तों पर घातक हमला कर चुके हैं।

संगठनों ने 2021 के मद्रास हाईकोर्ट के एक आदेश (WP 3656/2021, दिनांक 21 सितंबर 2021) का भी संज्ञान दिया है जिसमें मंदिरों या निजी स्वामित्व के लिए नए हाथियों को लाने पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि केवल उनके चिकित्सा उपचार के लिए ही हाथियों को कैद में रखा जा सकता है।

सस्थाओं के इस समूह ने आग्रह किया है कि तमिलनाडु के हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग को एक और हाथी के बच्चे को जंजीरों और अकेलेपन की सजा देने की बजाय, करुणा और आधुनिक सोच को अपनाना चाहिए। उन्हें मैकेनिकल हाथी का विकल्प अपनाना चाहिए, और हाथी के बच्चे को या तो जंगल में वापस छोड़ा जाए, और अगर संभव न हो, तो उसे किसी अभयारण्य में भेजा जाए, जहां वह स्वतंत्र रूप से, बिना हथियारों के डर के, अन्य हाथियों की संगत में रह सके।

इस साल जून में, अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन और PFCI ने अरुप्पुकोट्टई के श्री अष्टलिंग अतिकेषा सेल्व विनायगर और श्री अष्टभुजा अतिकेषा वाराही अम्मन मंदिरों को ‘गजा’ नाम का एक यांत्रिक हाथी दान किया था। दक्षिण भारत में गजा जैसे कम से कम 20 मैकेनिकल हाथियों का इस्तेमाल हो रहा है, जिनमें से 11 को “PETA इंडिया” द्वारा दान किया गया है। असली हाथियों की तुलना में, मैकेनिकल हाथियों को बहुत कम देखभाल की जरूरत होती है, उनके रखने और रखरखाव पर खर्च भी कम होता है और वो सुरक्षित भी होते हैं। उन्हें अकेलापन, गुस्सा या भूख या प्यास नहीं लगती और उनके निर्माण ओर रखरखाव के लिए कारीगरों को रोज़गार के अवसर भी मिलते हैं।

संयुक्त पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले संगठनों में शामिल हैं:
ऐनिमल रेन बसेरा (नई दिल्ली); ऐनिमल रेस्क्यू रिहैबिलिटेशन एंड ओवरऑल वेलनेस (केरल); ऐनिमल वेलफेयर ट्रस्ट एकमरा (भुवनेश्वर); ऐनिमल राहत (सांगली); कंपैशन अनलिमिटेड प्लस एक्शन – CUPA (बेंगलुरु); दया ऐनिमल वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन (केरल); दया मुवाटुपुझा (केरल); डॉग्स प्रोटेक्शन ट्रस्ट (मैसूर); दयकारा ट्रस्ट (ऑरोविल); फॉना पुलिस (नई दिल्ली); फ्रेंड फॉर ऐनिमल ट्रस्ट (बेंगलुरु); हीलिंग साथी (देहरादून); होप फॉर ऐनिमल्स (देहरादून); हेवेन फॉर ऐनिमल्स (चेन्नई); हेल्पिंग हैंड्स फॉर ऐनिमल्स (गाज़ियाबाद); हेरिटेज ऐनिमल टास्कफोर्स (त्रिशूर); ह्यूमेन ऐनिमल सोसाइटी (कोयंबटूर); लव फॉर फॉर्गॉटन (बेंगलुरु); PAWS एशिया (डोंबिवली); PAWS कनेक्ट (बेंगलुरु); PAWS त्रिशूर (त्रिशूर); प्राणा ऐनिमल फाउंडेशन (बेंगलुरु); पीपल फॉर ऐनिमल्स (चेन्नई); पीपल फॉर ऐनिमल्स (देहरादून); PFA त्रिवेंद्रम; PFAWTS (पिपलकोटी); पीपल फॉर कैटल इन इंडिया (चेन्नई); PETA इंडिया; पीपल फॉर ऐनिमल वेलफेयर (कन्नूर); शरणागत उत्तर रिफ्यूज (देहरादून); साउथ बेंगलुरु केयर्स (बेंगलुरु); समर्थ इंडिया चैरिटेबल ट्रस्ट (देहरादून); श्वाना फाउंडेशन (बेंगलुरु); यूनाइटेड सोसाइटी फॉर ऐनिमल्स (ओंगोल); उपघ्न (चेन्नई); वसुधैव कुटुम्बकम (बल्लारी); वीरोर (तुमकुर), एनिमल राइट्स फंड (बेंगलुरु), तपती एनिमल केयर चैरिटेबल ट्रस्ट (नई दिल्ली), कम्युनिटी स्ट्रीटीज़ ऑफ इंडिया (बेंगलुरु), मरुध्य – डॉग्स आर आवर बेस्ट फ्रेंड्स (बेंगलुरु), वॉकिंग आई फाउंडेशन फॉर एनिमल एडवोकेसी (त्रिशूर), सेफस्केप फाउंडेशन (बेंगलुरु), बर्ड्स ऑफ पैराडाइज़ फाउंडेशन (बेंगलुरु), सोसाइटी फॉर एलिफेंट वेलफेयर (कोल्लम), नम मक्कल चैरिटेबल ट्रस्ट (चेन्नई), रेस्क्यू बाय गरिमा एनिमल शेल्टर (देहरादून), इंटरनेशनल सेंटर फॉर अल्टरनेटिव्स इन रिसर्च एंड एजुकेशन (चेन्नई), नेचर एंड एनिमल कंज़र्वेन्सी (कोयंबटूर), वाइल्डलाइफ़ अवेयरनेस एंड रेप्टाइल कंज़र्वेशन ऑर्गनाइज़ेशन (तुमकुर), और तमिलनाडु वाइल्डलाइफ़ ऑर्गनाइज़ेशन (कोयंबटूर)।

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