कुत्तों, कबूतरों, वन्यजीवों और अन्य प्रजातियों पर बढ़ते हमलों के बीच, PETA इंडिया ने अखबार के पहले पन्ने पर ‘जीवदया हमारा मार्गदर्शन करे’ अभियान शुरू किया

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24 August 2025

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Hiraj Laljani; [email protected]

मुंबई- आज, PETA इंडिया ने देश को अहिंसा (non-violence) की हमारी गहरी जड़ों की याद दिलाते हुए ‘जीवदया हमारा मार्गदर्शन करे’ अभियान की शुरुआत की। यह अभियान संडे टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) और मुंबई संस्करणों के पहले पन्ने पर तथा मुंबई मिरर के कवर पेज पर प्रकाशित हुआ, जिसमें एक शाश्वत सत्य का संदेश था: ‘वसुधैव कुटुंबकम् – पूरी दुनिया एक परिवार है।’

PETA इंडिया, और वे सभी लोग जो प्यारे सामुदायिक कुत्तों और कबूतरों की परवाह करते हैं, जो हाथियों को जंजीरों से मुक्त करने के लिए काम करते हैं, और जो वनों में रहने वाले रीसस बंदरों व अन्य पशुओं की सुरक्षा को महत्व देते हैं सभी इस बात को लेकर गहराई से चिंतित हैं: हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय, जिसमें दिल्ली में केवल नगरपालिका द्वारा अधिकृत स्थानों पर ही सामुदायिक कुत्तों को खाना खिलाना वैध माना गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा कबूतरों को खाना खिलाने पर प्रतिबंध लगाना, जिससे ये कोमल और आश्रित पक्षी भूख से तड़प रहे हैं। और, वन्य जीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2022 के पारित होने के बाद रीसस बंदरों को दी जा रही 50 वर्षों पुरानी सुरक्षा को हटा देना, ताकि उन्हें प्रयोगों के लिए पकड़ा जा सके।

विज्ञापन की कॉपी मांगे जाने पर उपलब्ध कारवाई जाएगी।

यह प्रिंट अभियान – जिसमें लिखा है, ‘जब हम जीवदया का सम्मान करते हैं, तो हम भारत की अंतरात्मा का सम्मान करते हैं’,  पाठकों से अनुरोध करता है कि वे हमारे राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति सच्चे रहें और सभी जीवों के प्रति करुणा दिखाएं।यह अभियान यह भी इंगित करता है कि आज पशुओं के लिए वास्तविकता किस प्रकार उस दयालुता और जीवन के प्रति सम्मान की भावना से दूर हो चुकी है, जिसके लिए भारत हमेशा जाना और सराहा गया है – एक ऐसी मूल्य प्रणाली जिसे भारत ने दुनिया को अहिंसा और शाकाहार के माध्यम से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से ही उपहार स्वरूप दिया था। (लद्दाख की ब्रोकपा जनजाति के बारे में माना जाता है कि वे हजारों साल पहले से ही शुद्ध शाकाहारी (वीगन ) थे यानी ऐसे लोग जो न दूध, न घी, न कोई अन्य पशु-उत्पाद खाते हैं।)

इसमें आगे लिखा है:

  • कबूतर जैसे पंछी, जिन्हें अब तक रोज दाना मिलता था, अब भूख से बिलख रहे हैं।

  • कुत्तों को उन सड़कों से खदेड़ा जा रहा है, जिन्हें वे अपना घर मानते  हैं।

  • हाथी वनों में स्वतंत्रता से घूमने की बजाय जंजीरों में कैद हैं।

  • गायों की रक्षा की जानी चाहिए जबकि उन्हें  चमड़े के लिए मारा जा रहा है।

  • रीसस बंदरों को जंगलों से चुरा कर प्रयोगों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

अभियान के अंत में एक सशक्त याद दिलाई गई है : ‘आइए याद रखें: करुणा केवल हमारा इतिहास नहीं है, यह हमारा नैतिक कर्तव्य भी है। भारत की आत्मा में बसी दयालुता ही हमें आगे ले जाएगी। दया ही धर्म का मूल है।’

PETA इंडिया, जो हर साल जलीकट्टू के दौरान बैलों पर हिंसा और इंसानों की मृत्यु के खिलाफ अभियान चलाता है, नीति-निर्माताओं, देश की न्यायपालिका और नागरिकों से अनुरोध करता है कि वे इन करुणा के मूल्यों पर विचार करें और पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए कदम उठाएं चाहे वह अपने क्षेत्र में पशुओं की मदद करना हो, उन्हें सुरक्षा देने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करना हो, या फिर वीगन (पशु उत्पादों से मुक्त) जीवनशैली अपनाना हो।

PETA इंडिया के प्रवक्ता हीरज लालजानी कहते हैं- “भारत की पहचान हमेशा अहिंसा से जुड़ी रही है, और हम लोगों को यह याद दिलाना चाहते हैं कि जब हम पशुओं के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते हैं, तो हम अपनी ही विरासत का सम्मान करते हैं। पशु इस धरती पर हमारे इस्तेमाल करने के लिए नहीं, बल्कि हमारे साथ रहने के लिए हैं, दया हमारे राष्ट्र की सच्ची ताकत है, और हमें दुनिया और खुद को यह दिखाना चाहिए कि हम हमेशा इसके अनुरूप जीवन जीते हैं।”

PETA इंडिया – जो इस सिद्धांत के तहत काम करता है कि “पशु किसी भी तरीके से हमारा शोषण करने के लिए नहीं हैं” प्रजातिवाद (speciesism) का विरोध करता है। प्रजातिवाद एक ऐसी धारणा है जिसके तहत इंसान स्वयं को इस संसार में सर्वोपरि मानकर, अपनी जरूरतों के अनुसार अन्य प्रजातियों का इस्तेमाल एवं शोषण करता है। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट PETAIndia.com पर जाएँ और हमें XFacebookFacebook हिन्दी, तथा Instagram पर फॉलो करें।

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