PETA इंडिया की वैज्ञानिक की सह-लिखित शोध-पत्रिका: भारत आधुनिक गैर-पशु कीटनाशक परीक्षण में बन सकता है अग्रणी

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28 July 2026

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नई दिल्ली- दुनिया के कई देश अब कीटनाशकों की विषाक्तता की जांच के लिए आधुनिक और मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी तरीकों को अपना रहे हैं। ऐसे समय में प्रकाशित एक नई सहकर्मी-समीक्षित (पीयर-रिव्यूड) शोध-पत्रिका बताती है कि भारत के पास भी अपने नियमों को आधुनिक बनाने का एक बड़ा अवसर है। इससे पशुओं पर होने वाले परीक्षणों की जगह गैर-पशु विधियों को अपनाया जा सकेगा, वैज्ञानिक निर्णयों को बेहतर बनाया जा सकेगा, मानव और पर्यावरण की सुरक्षा बढ़ेगी और वैश्विक स्तर पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत होगी।

‘Redefining Pesticide Toxicity Assessment: An Approach to Incorporating Non-Animal Strategies’ शीर्षक वाले इस शोध-पत्र के सह-लेखकों में PETA इंडिया की एक वैज्ञानिक, एक पूर्व नियामक अधिकारी और उद्योग विशेषज्ञ शामिल हैं। शोध-पत्र के अनुसार, किसी नए कीटनाशक के सक्रिय घटक (एक्टिव इंग्रीडिएंट) को विकसित करने में 10 वर्ष से अधिक समय लग सकता है और विषाक्तता संबंधी परीक्षणों में 20,000 तक पशुओं का उपयोग किया जा सकता है। इनमें से कई परीक्षण दशकों पहले विकसित किए गए थे। इन्हें पूरा करने में काफी समय लगता है, ये यह सही ढंग से नहीं बता पाते कि कोई रसायन मनुष्यों या पर्यावरण को कैसे प्रभावित करेगा और ये मानव स्वास्थ्य के लिए भी पर्याप्त रूप से प्रासंगिक नहीं हैं।

चूंकि गैर-पशु विधियां मानव स्वास्थ्य के लिए अधिक प्रासंगिक, विश्वसनीय, आधुनिक और नैतिक हैं, इसलिए दुनिया के कई देशों के नियामक इन्हें तेजी से अपना रहे हैं। यह शोध-पत्र विज्ञान पर आधारित व्यावहारिक सुझाव देता है, जिनकी मदद से भारत कीटनाशकों की विषाक्तता जांचने के लिए गैर-पशु विधियों को अपना सकता है और साथ ही मानव तथा पर्यावरण की सुरक्षा के मानकों को बनाए रख सकता है या उन्हें और बेहतर बना सकता है।

यह शोध-पत्र ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है, जब सरकार कीटनाशक पंजीकरण संबंधी दिशानिर्देशों पर जनता से सुझाव मांग रही है। साथ ही, दुनिया भर में कीटनाशकों के परीक्षण के तरीकों को आधुनिक बनाने और इन परीक्षणों में पशुओं के उपयोग को समाप्त करने की दिशा में तेजी से काम हो रहा है। इसी वर्ष, यूरोपीय आयोग ने रासायनिक सुरक्षा आकलन के लिए पशुओं पर परीक्षण को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की अपनी योजना (Roadmap Towards Phasing Out Animal Testing for Chemical Safety Assessments) को मंजूरी दी। वहीं, अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (EPA) ने भी स्तनधारी पशुओं पर परीक्षणों के बजाय अधिक विश्वसनीय और मानव-प्रासंगिक गैर-पशु विधियों को अपनाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

लेखकों के अनुसार, भारत के मौजूदा नियम पहले से ही गैर-पशु विधियों को इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं। लेकिन कंपनियों को यह स्पष्ट नहीं होता कि व्यवहार में किन गैर-पशु विधियों को मंजूरी मिलेगी। इसलिए, नियामक प्रक्रिया में देरी से बचने के लिए वे पशुओं पर परीक्षण करना जारी रखती हैं। शोध-पत्र में सुझाव दिया गया है कि गैर-पशु विधियों की स्वीकृति के बारे में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, कंपनियों को आवेदन देने से पहले अपनी योजनाओं पर नियामकों से चर्चा करने का अवसर मिले और स्वीकृत गैर-पशु विधियों की जानकारी आसानी से उपलब्ध कराई जाए। इससे नियामकों और उद्योग, दोनों का भरोसा बढ़ेगा।

लेखकों का यह भी कहना है कि इसके लाभ केवल नियामक विज्ञान तक सीमित नहीं हैं। अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले से ही वैश्विक नियामक प्रस्तुतियों के लिए गैर-पशु आंकड़े तैयार कर रही हैं और भारत की कई प्रयोगशालाएं अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार की गई गैर-पशु विधियां उपलब्ध करा रही हैं। भारत के नियामक ढांचे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकसित हो रही प्रक्रियाओं और अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना नियामक समीक्षा को अधिक प्रभावी बना सकता है, वैश्विक बाजारों तक तेजी से पहुंच सुनिश्चित कर सकता है तथा वैश्विक स्तर पर विस्तार कर रही भारतीय कंपनियों और भारत में पंजीकरण चाहने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों—दोनों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है।

PETA इंडिया की वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अनुसंधान नीति सलाहकार डॉ. अंकिता पांडे कहती हैं, “भारत दुनिया के प्रमुख कीटनाशक उत्पादक और निर्यातक देशों में से एक है। अब उसके पास आधुनिक गैर-पशु नियामक विज्ञान के क्षेत्र में भी अग्रणी बनने का अवसर है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार किए गए, आधुनिक और विज्ञान-आधारित गैर-पशु तरीकों को अपनाने से भारत अपनी नियामक व्यवस्था को और मजबूत बना सकता है, नवाचार को बढ़ावा दे सकता है और भविष्य में वैश्विक स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत कर सकता है।”

हर वर्ष दुनिया भर में कीटनाशकों की विषाक्तता के परीक्षणों में हजारों पशुओं पर प्रयोग किए जाते हैं। इन पशुओं को जहरीले रसायनों को निगलने या सांस के माध्यम से भीतर लेने के लिए मजबूर किया जाता है, या फिर ये रसायन उनकी आंखों या त्वचा पर लगाए जाते हैं।

PETA इंडिया के वैज्ञानिक भारतीय नियामक ढांचे में उपलब्ध सर्वोत्तम विज्ञान को शामिल करने के लिए सरकार की पहलों का समर्थन करना जारी रखेंगे। इससे भारत किसानों और पर्यावरण की बेहतर सुरक्षा कर सकेगा, मानव स्वास्थ्य की रक्षा कर सकेगा और पशुओं को क्रूर परीक्षणों से बचाया जा सकेगा।

PETA इंडिया जो इस सिद्धांत के तहत काम करता है कि “पशु हमारे प्रयोग करने के लिए नहीं हैं”, प्रजातिवाद (speciesism) का विरोध करता है, जो मनुष्यों को अन्य प्रजातियों से श्रेष्ठ मानने वाली एक भेदभावपूर्ण विचारधारा है। अधिक जानकारी के लिए कृपया PETAIndia.com पर जाएं या X, Facebook या Instagram पर PETA इंडिया को फॉलो करें।

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