‘हाथी’, ‘घोड़े’ और ‘कुत्ते’ के भेष में जवाहरलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के बच्चों, PETA इंडिया, अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं ने साथ मिलकर जनता से पशु सर्कसों का समर्थन न करने की अपील करी।
बाल दिवस (14 नवंबर) से पहले, एनिमल्स विद ह्यूमैनिटी (AWH), पॉअपीपल एनजीओ और PETA इंडिया के सहयोग से जवाहरलाल नेहरू पब्लिक स्कूल के बच्चों ने पशुओं के मुखौटे पहनकर हाथों में संदेश लिखे बोर्ड पकड़कर जनता से पशु सर्कसन का समर्थन ना करने की अपील करी। श्यामला हिल्स पर हुए इस प्रदर्शन में घोड़े, हाथी और कुत्ते की पोशाक पहने बच्चों के हाथ में “पशु सर्कसों पर प्रतिबंध लगाओ” और “पशुओं को खुश रखो, पशु सर्कसों को ‘ना’ कहो” संदेश लिखे बोर्ड थे। इस प्रदर्शन का उद्देश्य PETA इंडिया की उस मांग का समर्थन करना है, जिसमें उसने केंद्र सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय से सर्कसों में पशुओं के इस्तेमाल को समाप्त करने की अपील की है, साथ ही यह जागरूकता फैलाना कि जब पशुओं को जबरन करतब कराए जाते हैं, तो वे उनके लिए बहुत कष्टकारी होता है।
ये बच्चे जानते हैं कि पशुओं को जंजीरों में बांधना और उन्हें पीटना गलत है, इसीलिए वे यहाँ एकत्र हुए हैं हैं ताकि लोगों को बता सकें कि सर्कसों में पशु कष्ट सहते हैं और सबको यह संदेश दे सकें कि वे केवल ऐसे मनोरंजन के कार्यक्रम का समर्थन करें जिनमें पशुओं का इस्तेमाल नहीं होता।
“हमारा स्कूल विद्यार्थियों को पशुओं के प्रति दया और संवेदनशीलता सिखाने के लिए प्रतिबद्ध है, क्योंकि हम जानते हैं कि दयालु बच्चे ही आगे चलकर जिम्मेदार वयस्क बनते हैं।”- चेतना जरोलिया, प्रधानाध्यापिका, जवाहरलाल नेहरू पब्लिक स्कूल
भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड (AWBI) की निरीक्षण रिपोर्टों और PETA इंडिया की सर्कसों पर की गई जांचों से यह सामने आया है कि सर्कसों में उपयोग किए जाने वाले पशुओं को लंबे समय तक कैद, शारीरिक अत्याचार और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। काम में इस्तेमाल करने वाले लोग उन्हें कंट्रोल करने के लिए कोड़े और अन्य हथियारों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे डर के कारण आग के छल्लों से कूदने जैसे खतरनाक करतब करने को मजबूर हो जाते हैं। प्रदर्शन न करने के समय भी ये पशु आजीवन दुख झेलते हैं। उन्हें पानी, भोजन और पशु-चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं भी बहुत सीमित रूप में मिलती हैं। कुत्तों को अक्सर तारों वाले छोटे पिंजरों में ठूंस दिया जाता है और शायद ही कभी बाहर निकाला जाता है। पक्षियों को गंदे, तंग पिंजरों में कैद रखा जाता है और उनके पंख इस तरह काट दिए जाते हैं कि वे उड़ नहीं पाते। घोड़ों को आमतौर पर छोटी रस्सियों से बांधकर रखा जाता है।
भारत के दो प्रमुख नियामक संस्थाओं, भारतीय जीव जन्तु कल्याण बोर्ड (AWBI) और केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सेंट्रल ज़ू अथॉरिटी-CZA) ने यह स्वीकार किया है कि पशुओं का इस्तेमाल करने सर्कसों में पशुऑन के प्रति क्रूरता निहित होती है और भारत में सर्कसों में पशुओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। पशु कल्याण से जुड़ी चिंताओं को देखते हुए AWBI ने पहले ही केंद्र सरकार को पूरे देश में सर्कसों में पशुओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए कानून बनाने की सलाह दी थी, और CZA ने भी इसी कारण सर्कसों में हाथियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के समर्थन में पत्र लिखा था। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत संरक्षित जंगली पशुओं की सुरक्षा CZA के अधिकार क्षेत्र में भी आती है। 2018 में केंद्र सरकार ने एक प्रारूप अधिसूचना जारी की थी, जिसमें पूरे भारत में सर्कसों में सभी पशुओं के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा गया था; हालांकि, इस नियम संशोधन को अभी तक पारित नहीं किया गया है। बोलीविया, बोस्निया और हर्जेगोविना, साइप्रस, ग्रीस, ग्वाटेमाला, होंडुरास और माल्टा जैसे देशों ने सर्कसों में सभी पशुओं के उपयोग पर पहले ही प्रतिबंध लगा दिया है। PETA इंडिया भारत से भी इसी कदम का अनुसरण करने की अपील करता है।
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