इंडियन एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स काउंसिल (ASCI) ने PETA इंडिया के उस अभियान को रोकने का प्रयास किया, जिसमे पुच गया था- “यदि आप कुत्तों का दूध नहीं पीते, तो किसी अन्य प्रजाति का दूध क्यों पीते हो?”

Posted on by Surjeet Singh

Advertising Standards Council of India (ASCI) ने PETA इंडिया के एक बिलबोर्ड अभियान पर आपत्ति जताई है, जिसमें एक सरल लेकिन सोचने पर मजबूर करने वाला सवाल पूछा गया था: “अगर आप कुत्ते का दूध नहीं पीएंगे, तो किसी और प्रजाति का दूध क्यों पीते हैं?” यह बिलबोर्ड जून में विश्व दुग्ध दिवस के अवसर पर भोपाल, चेन्नई, मुंबई, अहमदाबाद, नोएडा, हैदराबाद और बेंगलुरु में लगाया गया था। इसका उद्देश्य स्पीशीज़िज़्म (प्रजाति के आधार पर भेदभाव) जो नस्लभेद या लैंगिक भेदभाव की तरह एक भेदभाव का रूप है, पर बातचीत शुरू करना था, और यह संदेश हास्यपूर्ण और हल्के-फुल्के अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया था।

अभियान में एक महिला को कुत्ते का दूध पीते हुए दिखाया गया था ताकि यह बताया जा सके कि कई लोग पाशु के दूध के सेवन को लेकर कितनी विरोधाभासी सोच रखते हैं। इसमें जनता को यह सोचने के लिए प्रेरित किया गया कि जैसे कुत्ते अपने बच्चों के लिए दूध बनाते हैं, वैसे ही गाय और भैंस भी अपना दूध अपने बच्चों के लिए ही बनाती हैं, न कि इंसानों के लिए। यह अभियान गैर-व्यावसायिक और शैक्षणिक होने के बावजूद, एक गुमनाम शिकायत के बाद ASCI ने इसे “जनभावनाओं के प्रति असंवेदनशील” बताते हुए निंदा की। PETA इंडिया का कहना है कि वास्तव में जनता को जो आक्रोश है, वह गायों और भैंसों पर डेयरी उद्योग की क्रूरता को लेकर है, और संगठन ने ASCI की निंदा के इस प्रयास को अस्वीकार कर दिया है।

जब गायों और भैंसों का जीवन दांव पर लगा हो, तब PETA इंडिया चुप नहीं बैठेगा। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारा संवैधानिक अधिकार है। जैसे यह गलत होगा कि केवल कुछ लोगों को असुविधा होती है, इसलिए संगठनों को बाल श्रम या महिलाओं के उत्पीड़न जैसी हानिकारक प्रथाओं पर सवाल उठाने से रोका जाए, वैसे ही यह भी गलत है कि एक पाशु अधिकार संगठन को इसलिए चुप कराने की कोशिश की जाए क्योंकि वह जनता से यह सोचने का आग्रह कर रहा है कि डेयरी उद्योग में गायों और भैंसों के साथ कितना अमानवीय व्यवहार किया जाता है।

PETA इंडिया यह बताती है कि गाय और भैंस अपनी इच्छा से इंसानों को दूध “नहीं देतीं”। इंसानों के उपयोग के लिए दूध हासिल करने के लिए नर बछड़ों को अक्सर भूखा रखा जाता है, त्याग दिया जाता है या मार दिया जाता है क्योंकि वे दूध नहीं दे सकते। वहीं मादा बछड़ों को दूध के विकल्प पर पाला जाता है और उन्हें अपनी माताओं की तरह ही पीड़ा के उसी चक्र में धकेल दिया जाता है उन्हें दूध मशीन की तरह तब तक इस्तेमाल किया जाता है जब तक उनका शरीर जवाब नहीं दे देता, और उसके बाद कई को या तो छोड़ दिया जाता है या सस्ते मांस के लिए मार दिया जाता है।

PETA समूह ने चेतावनी दी है कि नैतिक और आचार संबंधी मुद्दों पर संदेशों को सेंसर करने के प्रयास एक चिंताजनक मिसाल कायम करते हैं, और इस तरह की अति और अत्यधिक सेंसरशिप से ASCI की विश्वसनीयता पर जनता का भरोसा कमजोर पड़ सकता है। PETA इंडिया ने यह भी चेतावनी दी है कि गुमनाम शिकायतों को जो व्यक्तिगत दुश्मनी या स्वार्थ से प्रेरित हो सकती हैं सामग्री पर नियंत्रण का आधार बनाना, जिम्मेदार मार्गदर्शन के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है।

क्रूरता के अलावा, डेयरी उत्पादों का सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है। विश्व की 75 प्रतिशत आबादी जिसमें अधिकांश भारतीय शामिल हैं लैक्टोज  को नहीं पचा पाते।  गाय का दूध वसा से भरपूर होता है, यह एक आम एलर्जन है, और मोटापा, मधुमेह तथा कुछ प्रकार के कैंसर जैसी बीमारियों से जुड़ा हुआ है।

जिस तरह इंसानों में खुशी, डर, भूख, प्यार और अकेलेपन की भावना होती है, उसी तरह सभी पाशु, चाहे वे कुत्ते हों, गाय हों या मुर्गियां।  इन भावनाओं को महसूस करने की क्षमता रखते हैं।

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