AI को लेकर चिंताओं के बीच, PETA इंडिया के बेंगलुरु बिलबोर्ड अभियान का संदेश: मांस उद्योग पर्यावरण और पशुओं के लिए कहीं ज़्यादा खतरनाक है
बेंगलुरु में साइफर AI एक्सपो 2026 और वर्ल्ड AI समिट की तैयारियां चल रही हैं। इसी बीच, AI से जुड़ी तकनीकों और उनके बुनियादी ढांचे के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर लोगों की चिंता बढ़ रही है। ऐसे समय में PETA इंडिया ने अपने बिलबोर्ड अभियान का पहला चरण शुरू किया है। यह अभियान मांस, अंडे और डेयरी उद्योगों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान और पशुओं को पहुंचने वाली तकलीफों की ओर ध्यान दिलाता है। साथ ही, लोगों को वीगन बनने के लिए प्रोत्साहित करता है। अक्टूबर में विश्व शाकाहारी माह के दौरान शुरू किए गए इस अभियान का संदेश है: “पर्यावरण के संसाधनों की सबसे बड़ी बर्बादी AI नहीं, मांस उद्योग करता है। कृपया, वीगन बनें।” बेंगलुरु से शुरू होने वाला यह अभियान भारत के अन्य AI-केंद्रित शहरों में भी पहुंचाया जाएगा।
पानी के इस्तेमाल में दोनों उद्योगों के बीच बहुत बड़ा अंतर है। एक सहकर्मी-समीक्षित वैश्विक अध्ययन के अनुसार, पशुओं से मिलने वाले खाद्य पदार्थों के उत्पादन के लिए हर साल लगभग 566 अरब घन मीटर पानी निकाला जाता है। यह 2027 तक दुनिया भर में AI से जुड़े कामों के लिए अनुमानित अधिकतम 6.6 अरब घन मीटर पानी की जरूरत से 85 गुना से भी अधिक है। पशु-आधारित खाद्य पदार्थों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पानी में से लगभग 513 अरब घन मीटर पानी पशुओं के चारे की फसलें उगाने के लिए सिंचाई में खर्च होता है। करीब 40 अरब घन मीटर पानी पशुओं को पिलाया जाता है, जबकि लगभग 13 अरब घन मीटर पानी पशुपालन से जुड़ी सुविधाओं में इस्तेमाल होता है।

PETA इंडिया का यह बिलबोर्ड बेंगलुरु के कोरमंगला इंडस्ट्रियल लेआउट में, 1, होसुर रोड, संथोसापुरम, कोरमंगला, कर्नाटक 560029 पर लगा है।
AI से जुड़े बुनियादी ढांचे में पानी और ऊर्जा की खपत पर भले ही अधिक ध्यान दिया जा रहा हो, लेकिन पशुपालन उद्योग भी दुनिया के सबसे अधिक संसाधन इस्तेमाल करने वाले उद्योगों में से एक है। इसमें बहुत अधिक पानी और जमीन खर्च होती है और ग्रीनहाउस गैसों का भी काफी उत्सर्जन होता है। इसके साथ ही, हर साल अरबों पशुओं को भारी तकलीफ झेलनी पड़ती है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, जलवायु संकट के सबसे गंभीर प्रभावों को रोकने के लिए दुनिया भर में लोगों को वीगन खान-पान अपनाने की जरूरत है। पशुपालन से इंसानों की गतिविधियों के कारण होने वाले कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग पांचवां हिस्सा होता है। भारत की गायों और भैंसों से ही दुनिया भर में पशुपालन से होने वाले उत्सर्जन का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा निकलता है। इसका मुख्य कारण मीथेन गैस है। शोध से पता चलता है कि वीगन बनने से किसी व्यक्ति के खान-पान से जुड़ा कार्बन फुटप्रिंट 73 प्रतिशत तक कम हो सकता है। यानी, पर्यावरण पर अपने प्रभाव को कम करने के लिए कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर यह सबसे प्रभावी कदमों में से एक उठा सकता है।
भारत चौथी शताब्दी ईसा पूर्व से ही मांस-मुक्त खान-पान के जरिए दुनिया को पशुओं और पर्यावरण के प्रति दयालु होना सिखाता आया है। आज भी दुनिया में सबसे अधिक मांस-मुक्त आबादी भारत में है, जबकि भारत के लगभग 10 प्रतिशत लोग खुद को वीगन मानते हैं। वीगन बनने वाला हर व्यक्ति हर साल करीब 200 पशुओं तक को शोषण और तकलीफ से बचा सकता है। इससे उसका कार्बन फुटप्रिंट भी काफी कम होता है और हृदय रोग, डायबिटीज़ तथा कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम घटाने में मदद मिल सकती है।
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