PETA इंडिया की शिकायत के बाद, मथुरा वन प्रभाग ने अवैध रूप से कैद किए गए लंगूर के मामले में POR दर्ज की
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24 May 2025
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Hiraj Laljani; [email protected]
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मथुरा – एक भारतीय ग्रे लंगूर को पेड़ से बाँधकर अवैध रूप से कैद किए जाने की जानकारी सामने आने के बाद पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ ऐनिमल्स (PETA) इंडिया ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए उत्तर प्रदेश वन विभाग के मथुरा वन प्रभाग को सूचित किया। संगठन की शिकायत पर ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972’ की धारा 9, 39 और 51 के तहत एक प्रारंभिक अपराध रिपोर्ट (POR) दर्ज की गई है।
इस पीड़ित लंगूर को रेस्क्यू कर पुनर्वासित किया गया और सभी आवश्यक प्रक्रियाओं, जिनमें स्वास्थ्य जांच भी शामिल है, का पालन करते हुए उसे उसके प्राकृतिक आवास में सुरक्षित रूप से छोड़ दिया गया। भारतीय ग्रे लंगूर वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची II के अंतर्गत संरक्षित प्रजाति है। ऐसे में इन लंगूरों को पकड़ना, पालतू पशुओं की तरह कैद में रखना या उनसे जबरन कोई प्रदर्शन करवाना एक दंडनीय अपराध है, जिसके लिए तीन साल तक की सज़ा, एक लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
PETA इंडिया की क्रूएल्टी रिस्पॉन्स कॉर्डिनेटर श्रीधरा पुरोहित ने कहा, “PETA इंडिया मथुरा वन प्रभाग का, विशेष रूप से श्री रजनीकांत मित्तल, IFS, प्रभागीय वन अधिकारी (DFO), मथुरा का आभार प्रकट करता है, जिन्होंने लंगूर को अवैध कैद से छुड़ाने और POR दर्ज करवाने के लिए तत्कालिक कार्रवायी करी। PETA इंडिया सभी संवेदनशील नागरिकों से अपील करता है कि वे सतर्क रहें और यदि वन्यजीवों या अन्य किसी भी पशु के साथ क्रूरता की कोई घटना देखें, तो तुरंत पुलिस या वन विभाग जैसे संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना दें।”
भारतीय ग्रे या हनुमान लंगूर जंगलों में अपने परिवारों के साथ रहते हैं, जहां वे आज़ादी से उछल कूद करते हैं, पेड़ों पर झूलते हैं और घनिष्ठ समूहों में जीवन बिताते हैं। वे एक-दूसरे के साथ खेलते हैं, मौज मस्ती करते हैं, और सामाजिक रिश्तों को निभाते हैं। जब कोई खतरा महसूस होता है, तो परिवार के सदस्य बिना देर किए एक-दूसरे की रक्षा में आगे आते हैं।
घरों में “पालतू पशु” के रूप में रखे गए या सड़कों पर नचाने के लिए मजबूर किए गए बंदरों को अक्सर जंजीरों से बाँधा जाता है या बेहद छोटे पिंजरों में कैद करके रखा जाता है। मनोरंजन के लिए इन मासूम पशुओं से जबरन करतब करवाए जाते हैं, जिसके लिए उन्हें मार-पीट, भूख और डर के माध्यम से प्रशिक्षित किया जाता है। अत्याचार की हद तब पार हो जाती है जब उनका आत्मरक्षा करने का भी अधिकार छीन लिया जाता है और उनके दांत तक उखाड़ दिए जाते हैं ताकि वे किसी को काट न सकें। वर्ष 1998 में, केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत एक अधिसूचना जारी कर यह स्पष्ट निर्देश दिया कि बंदरों और अन्य कई जंगली प्रजातियों को प्रदर्शन करने या प्रशिक्षण देने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
PETA इंडिया इस सिद्धांत में विश्वास रखता है कि “पशु मनुष्यों द्वारा शोषित होने के लिए नहीं हैं”, प्रजातिवाद का विरोध करता है। प्रजातिवाद एक ऐसी धारणा है जिसके तहत इंसान स्वयं को इस संसार में सर्वोपरि मानकर, अपनी जरूरतों के अनुसार अन्य प्रजातियों का इस्तेमाल एवं शोषण करता है। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट PETAIndia.com पर जाएँ और हमें X, Facebook, Facebook हिन्दी, तथा Instagram पर फॉलो करें।
संपर्क: Hiraj Laljani 9619167382; [email protected] Sanskriti Bansore 9167937382; [email protected]
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